देहरादून , अप्रैल 28 -- उत्तराखंड विधानसभा में मंगलवार को महिला आरक्षण पर एकदिवसीय विशेष सत्र आयोजित किए जाने के लिए अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक शर्मा ने औचित्यहीन और जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी करार दिया है। वह आज देहरादून स्थित पार्टी मुख्यालय में राज्य कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

श्री शर्मा ने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम वर्ष 2023 में ही संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है। इसके बावजूद भाजपा केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर देश की जनता को गुमराह करने का काम कर रही है। उन्होंने कहा कि जिस बिल को संसद के विशेष सत्र में लाया गया, वह वास्तव में महिला आरक्षण से जुड़ा नहीं बल्कि एक परिसीमन संशोधन बिल था, जो पूरी तरह से विभाजनकारी और सत्ता केंद्रीकरण का प्रयास था। उन्होंने कहा कि विपक्ष की एकजुटता के कारण भाजपा का यह मनमाना बिल पास नहीं हो सका, क्योंकि यदि यह पारित हो जाता, तो भाजपा को असीमित शक्तियां मिल जातीं और लोकतांत्रिक संतुलन पर गहरा आघात होता।

राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा कि आज उत्तराखंड सरकार द्वारा बुलाया गया यह विशेष विधानसभा सत्र असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की एक कोशिश है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब महिला आरक्षण पर अंतिम निर्णय संसद को करना है, तो राज्य की विधानसभा में करोड़ों रुपये खर्च कर इस सत्र का औचित्य क्या है? उन्होंने कहा कि लगभग 8 करोड़ रुपये जनता के टैक्स का पैसा इस दिखावटी सत्र पर खर्च किया जा रहा है। क्या यह पैसा उत्तराखंड की महिलाओं की सुरक्षा, बेरोजगार युवाओं, या धरने पर बैठी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता था? उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड हिमालयी राज्यों में महिला अपराध में शीर्ष पर पहुंच चुका है, लेकिन सरकार इस पर चर्चा करने से बच रही है।

श्री शर्मा ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि अंकिता भंडारी हत्याकांड, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया, उस पर इस विशेष सत्र में एक शब्द तक नहीं। नर्सिंग बेरोजगार सड़क पर हैं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आंदोलन कर रही हैं, लेकिन सरकार को सिर्फ राजनीतिक भाषण देना है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का भाषण समाधान नहीं, बल्कि एक नाटक, नौटंकी और बोगस प्रस्तुति बनकर रह गया। और सबसे बड़ा सवाल महिला आरक्षण पर जनगणना और परिसीमन जैसी शर्तें जोड़ने की जरूरत ही क्या थी? क्या यह महिलाओं को अधिकार देने की ईमानदार कोशिश है, या इसे टालने की रणनीति?कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व संसद और सरकार में ऐतिहासिक रूप से कम रहा है।

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