नयी दिल्ली , अक्टूबर 25 -- कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की क्रीमी लेयर के एक मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को लागू करने में प्रशासनिक एवं कानूनी चुनौतियों को हवाला देकर चेतावनी दी है कि इस फैसले के बीते समय (भूतलक्षी कार्यान्वयन) से लागू करने पर पुरानी भर्तियों, अधिकारियों की वरिष्ठता और सेवा आवंटन पर गहरा असर पड़ सकता है।

डीओपीटी ने इन चुनौतियों को देखते हुए न्यायालय के निर्णय पर स्पष्टता और निर्देश मांगने के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया है। विभाग के अनुसार, फैसले को लागू करने से देशभर में केंद्र और राज्य सरकारों की भर्तियों तथा ओबीसी आरक्षण नीति पर "गहरा असर" पड़ सकता है। डीओपीटी के अनुसार, इससे संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) के अनुपालन पर सवाल उठ सकते हैं और भविष्य में मुकदमेबाजी बढ़ सकती है। इसका असर संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी), कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे भर्ती बोर्ड, और बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान जैसी प्रमुख एजेंसियों की भर्तियों पर भी पड़ सकता है।

इस मामले में न्यायालय ने फैसला लागू करने के लिए छह महीने की समय सीमा दी थी। विभाग ने इस समय सीमा के समाप्त होने से पहले 24 अगस्त को एक आवेदन दायर किया था। न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के तय सिद्धांतों के अनुसार छह महीने के भीतर सुपरन्यूमरेरी (अतिरिक्त) पद सृजित करने का निर्देश दिया था।

विभाग ने उन ओबीसी उम्मीदवारों के क्रीमी लेयर तय करने में वेतन जैसे किसी स्पष्ट मानदंड के अभाव पर भी चिंता जताई, जिनके माता-पिता सरकारी सेवा या संवैधानिक पदों पर नहीं हैं।

विभाग के अनुसार, अगर याचिकाकर्ताओं को उनके मूल चयन वर्ष के आधार पर वरिष्ठता दी जाती है, तो गंभीर परेशानियां सामने आ सकती हैं। इसके अलावा, एक दशक से पुराने अधिकारियों के कैडर और सेवा आवंटन में बदलाव से एक "न खत्म होने वाली प्रक्रिया" शुरू हो सकती है।

न्यायालय के फैसले का सीधा असर सिविल सेवा परीक्षा 2025 के उन अभ्यर्थियों पर पड़ा है, जिनके अंतिम परिणाम 6 मार्च को घोषित किए गए थे। यह परिणाम न्यायालय के फैसले से ठीक पांच दिन पहले घोषित हुआ था पर उस समय सेवा आवंटन को अंतिम रूप नहीं दिया गया था। विभाग ने कहा कि सेवा आवंटन पूरा होने के बाद उसे बदलना बेहद कठिन होगा, इसलिए आगे बढ़ने से पहले न्यायालय से निर्देश मांगे गए हैं।

उच्चतम न्यायालय ने इस साल 11 मार्च को ओबीसी की 'क्रीमी लेयर' (वे लोग जो आर्थिक या सामाजिक रूप से सक्षम हैं और जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता) को तय करने के नियमों पर एक फैसला सुनाया था। डीओपीटी का कहना है कि इस फैसले को पुराने समय से लागू किया गया, तो बड़ा भ्रम और प्रशासनिक मुसीबत खड़ी हो जाएगी।

यह मामला भूतलक्षी (बीते समय से लागू होने वाले) प्रभाव के खतरे में इसलिए आ गया है, क्योंकि जिस मुख्य मामले पर फैसला दिया, वह कई साल पुरानी भर्तियों से जुड़ी एक याचिका थी। याचिका उन उम्मीदारों ने दाखिल की थी जो ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षण का दावा कर रहे थे, लेकिन उन्हें क्रीमी लेयर में आया मानकर आरक्षण से बाहर कर दिया गया था।

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