भुवनेश्वर , जून 23 -- ओडिशा सरकार ने पुरी के प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा को निभाते हुए भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की पूजा-पाठ और धार्मिक रस्मों में इस्तेमाल होने वाला 380 किलोग्राम 'बासुंगा पाट' (एक खास पवित्र रेशमी धागा) मंगलवार को मंदिर प्रशासन को भेज दिया है।
राज्य के कपड़ा और हस्तशिल्प मंत्री प्रदीप बाल सामंत ने सालाना खेप को हरी झंडी दिखाकर रवाना करते हुए कहा कि यह कदम ओडिशा की संस्कृति, पुरानी परंपराओं और यहां के बुनकरों की कला को बचाए रखने की सरकार की एक बड़ी कोशिश है।
पवित्र 'बासुंगा पाट' भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की विभिन्न धार्मिक रस्मों का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती हैं।
उन्होंने बताया कि 'बासुंगा पाट' सिर्फ एक धागा नहीं है, बल्कि यह जगन्नाथ संस्कृति और ओडिशा के गौरवशाली इतिहास से जुड़ा एक पवित्र और अनोखा 'सिल्क कोड' है। इसे शहतूत (मलबरी) के प्राकृतिक रेशम के धागों से तैयार किया जाता है और इस पर कैथे (कबीट) के फल की लकड़ी से निकाले गये प्राकृतिक गोंद का रंग चढ़ाया जाता है। यह धागा अध्यात्म, पारंपरिक कारीगरी और प्राचीन कपड़ा ज्ञान का एक अद्भुत संगम है।
श्री सामंत ने कहा कि बासुंगा पाट ओडिशा की कभी न खत्म होने वाली मंदिर परंपराओं और कारीगरों की भक्ति का प्रतीक है। महाप्रभु की सेवा में इसका लगातार इस्तेमाल होना राज्य की अनमोल सांस्कृतिक और हथकरघा विरासत को जिंदा रखता है।
कपड़ा मंत्री ने सरकार की एक और बड़ी और संवेदनशीलता से भरी पहल के बारे में बताया कि अब इस पवित्र बासुंगा पाट को 'करुणा सिल्क' तकनीक से तैयार किया जा रहा है। आम तौर पर रेशम निकालने के लिए कीड़ों को खौलते पानी में मार दिया जाता है, लेकिन इस नैतिक और अहिंसक तरीके में रेशम के कीड़ों को मारा नहीं जाता। उन्हें अपना प्राकृतिक जीवन चक्र पूरा करने दिया जाता है और जब वे तितली बनकर कोकून से बाहर निकल जाते हैं, तब बचे हुए हिस्से से यह पवित्र रेशम इकट्ठा किया जाता है।
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