भुवनेश्वर , अगस्त 08 -- ओडिशा विधानसभा की अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी ने शनिवार को कहा कि भारत की टीबी खत्म करने की कोशिशों में एक बड़ी चुनौती ऐसे मामले हैं, जिन पर दवाओं का असर नहीं होता है तथा ऐसे मामलों से निपटने के लिए विभिन्न एजेंसियों को बेहतर सहयोग बढ़ाना चाहिए।
श्रीमती पाढ़ी ने यहां स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से अपील की है कि वे वैज्ञानिक तरक्की को असरदार सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों में बदलने के लिए मिलकर काम करें। उन्होंने एम्स भुवनेश्वर में टीबी पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन और नीतिगत संवाद के समापन समारोह को संबोधित करते हुए उन्नत जीनोटाइपिक टेस्टिंग का इस्तेमाल करके ऐसी जानकारी जुटाने के लिए प्रारंभिक परियोजना शुरू करने का भी आह्वान किया, जो भविष्य की नीतिगत फैसलों में मददगार साबित हो सके।
उन्होंने कहा कि यूनिवर्सल ड्रग ससेप्टिबिलिटी टेस्टिंग (यूडीएसटी) इलाज के नतीजों को बेहतर बनाने, बीमारी के फैलाव को कम करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'टीबी-मुक्त भारत' के विजन को सिर्फ़ एक सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तौर पर नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी, वैज्ञानिक तरक्की और समुदाय की सक्रिय भागीदारी से चलने वाले एक राष्ट्रीय आंदोलन के तौर पर देखा जाना चाहिए।
इस सम्मेलन में नीति-निर्माता, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, डॉक्टर, शोधकर्ता, राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी ) के अधिकारी, विकास सहयोगी और स्वास्थ्य सेवा पेशेवर एक साथ आए। उन्होंने टीबी की जांच, निगरानी और शोध को मजबूत करने तथा भारत को टीबी-मुक्त देश बनाने की कोशिशों को तेज करने पर चर्चा की। ओडिशा के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री मुकेश महालिंग ने कहा कि टीबी को पूरी तरह खत्म करने के लिए सरकारी एजेंसियों, चिकित्सा संस्थानों, शोधकर्ताओं, प्रयोगशालाओं, फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों, विकास सहयोगियों और समुदायों के बीच आपसी तालमेल और मिली-जुली कोशिशों की ज़रूरत होगी।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार, एम्स भुवनेश्वर और दूसरे हितधारकों के साथ मिलकर ऐसी प्रारंभिक परियोजनाएं लागू करने को तैयार है, जिनका मकसद सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में उन्नत डायग्नोस्टिक तकनीक की व्यवहार्यता, किफायती होने और बड़े पैमाने पर लागू करने की क्षमता का आकलन करना है। महालिंग ने इस बात पर ज़ोर दिया कि टीबी की जांच में होने वाले नवाचार आखिरकार ग्रामीण, आदिवासी और दूर-दराज़ के इलाकों में मरीज़ों तक पहुँचने चाहिए, जहाँ असरदार इलाज और बीमारी को फैलने से रोकने के लिए समय पर और सही पहचान बहुत ज़रूरी है।
एम्स भुवनेश्वर के कार्यकारी निदेश एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डॉ. आशुतोष बिस्वास ने कहा कि संस्थान टीबी रिसर्च, मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स, जीनोमिक्स और सबूतों पर आधारित नीति बनाने के काम को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि ओडिशा के दो ज़िलों में प्रारंभिक आधार पर टीबी की जांच के लए केंद्र शुरू करने के लिए बातचीत चल रही है, ताकि ऐसे सबूत जुटाए जा सकें जो पूरे राज्य में इसे बड़े पैमाने पर लागू करने में मदद कर सकें। समारोह में मौजूद विशेषज्ञों ने टीबी की निगरानी, जांच, संक्रियात्मक अनुसंधान और कार्यान्वयन विज्ञान को मज़बूत करने के लिए एम्स भुवनेश्वर, ओडिशा सरकार, एनटीईपी , अनुसंधानन संस्थानों, विकास साझेदारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियों के बीच एक मज़बूत सहयोग वाले ढांचे की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। कॉन्क्लेव का समापन मज़बूत संस्थागत सहयोग और सबूतों पर आधारित रणनीतियों पर ज़ोर देने के साथ हुआ, ताकि टीबी को खत्म करने की प्रक्रिया में तेज़ी लाई जा सके और ऐसे मामलों से निपटा जा सके, जिन पर दवाओं का असर नहीं होता है।
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