भुवनेश्वर , अप्रैल 18 -- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने ओडिशा में उदयगिरि बौद्ध संरक्षित पुरातात्विक स्थल के आसपास मानवीय हस्तक्षेप और अतिक्रमण पर चिंता व्यक्त करते हुए जाजपुर जिला प्रशासन और पुलिस से इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा है।
उदयगिरि को व्यापक रूप से ओडिशा के सबसे बड़े बौद्ध परिसरों में से एक माना जाता है, जो इस क्षेत्र की समृद्ध बौद्ध विरासत को प्रदर्शित करता है। यह ललितगिरि और रत्नगिरि के साथ बौद्ध विरासत स्थलों के 'हीरक त्रिभुज' का हिस्सा है। इस स्थल पर प्राचीन मठ और स्तूप मौजूद हैं। इनका निर्माण 7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच का बताया जाता है।
रिपोर्टो के अनुसार संरक्षित बौद्ध विरासत स्थल की तलहटी में 200 मीटर के प्रतिबंधित क्षेत्र के भीतर अवैध निर्माण जोरों पर है।
एएसआई ने 'प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958' के कानूनी प्रावधानों के तहत अतिक्रमणकारियों को काम रोकने का नोटिस जारी किया है।
एएसआई (पुरी सर्कल) के अधीक्षक पुरातत्वविद् डॉ. दिबिशदा ब्रजसुंदर गरनायक ने कहा कि जाजपुर के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को एएसआई-संरक्षित बौद्ध विरासत स्थल के प्रतिबंधित क्षेत्र के आसपास हो रहे अवैध निर्माण के बारे में सूचित कर दिया गया है। इस संबंध में पुलिस में शिकायत भी दर्ज करायी गयी है।
बौद्ध शोधकर्ताओं के अनुसार, चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इन स्थलों की यात्रा की थी। उदयगिरि-रत्नगिरि-ललितगिरि के मठ नालंदा और तक्षशिला जैसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्रों के समकक्ष थे। ये अद्भुत और विशाल मठ विशिष्ट रूप से निर्मित हैं और हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इनकी अनूठी शैली भारत में कहीं भी पाये जाने वाले अन्य बौद्ध स्मारकों से अलग है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस पूरे क्षेत्र में अब भी अनछुए बौद्ध खजानों का समृद्ध भंडार मौजूद है। बौद्ध पुरातत्व संपदा का 90 प्रतिशत हिस्सा अब भी जमीन के गर्भ में छिपा है। यदि एएसआई इन अनछुए खजानों की खोज करता है तो ये मठ देश के बेहतरीन बौद्ध विरासत स्थलों में से एक होने का दावा कर सकते हैं। ये विशाल स्तूप और मठ, जिन पर बौद्ध वास्तुकला की नक्काशी की छाप है, ऐसे दुर्लभ स्मारक हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप में कहीं और नहीं मिलते।
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