मुंबई , अक्टूबर 06 -- महाराष्ट्र वक्फ न्यायाधिकरण ने मुंबई स्थित ऐतिहासिक 'खिलाफत हाउस' में चल रहे निर्माण और जीर्णोद्धार कार्य पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। न्यायाधिकरण ने इस संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई चार दिन के लिए स्थगित करते हुए अगली सुनवाई की तारीख नौ अक्टूबर तय की है।

इस याचिका पर सुनवाई महाराष्ट्र वक्फ न्यायाधिकरण के जज वाईएमएच खराड़ी तथा सदस्य अनंत गव्हाणे और मोहम्मद मोहिउद्दीन मोइद की पीठ ने की।

खिलाफत हाउस की ओर से पेश अधिवक्ता गुलाम दस्तगीर शेख ने दलील दी कि यह याचिका महज वित्तीय लाभ हासिल करने और अदालत का समय बर्बाद करने के इरादे से दायर की गई है, इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय और अन्य अदालतों के फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने याचिकाकर्ता के दावों को खारिज किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस परिसर का इस्तेमाल केवल शैक्षणिक कार्यों के लिए होगा और वर्तमान निर्माण कार्य एक शैक्षणिक संस्थान के लिए कराया जा रहा है।

अधिवक्ता शेख ने अदालत को बताया कि यह जमीन असल में राज्य सरकार की है और इसे 'खिलाफत हाउस' को पट्टे पर दिया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के पास जारी निर्माण कार्य रुकवाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परिसर में किसी भी तरह के होटल या व्यावसायिक गतिविधि का संचालन नहीं होगा। यह निर्माण शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है, जिससे आम जनता और मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग को फायदा मिलेगा। उन्होंने विकास कार्य में अड़ंगा डालने वाली इस याचिका को खारिज करने की अपील की।

याचिकाकर्ता एवं मुंबई के सामाजिक कार्यकर्ता शाहिद मंसूरी की ओर से पेश अधिवक्ता एनी डी निंबालकर ने तर्क दिया कि खिलाफत हाउस का भूखंड वक्फ संपत्ति है और वक्फ अधिकारियों की पूर्वानुमति के बिना वहां कोई भी निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने अदालत के समक्ष दावा किया कि इस कार्य के लिए वक्फ बोर्ड से कोई अनुमति नहीं ली गयी है, इसलिए जारी निर्माण कार्य पूरी तरह गैर-कानूनी है।

अपने दावे के पक्ष में निंबालकर ने वक्फ संपत्तियों की एक सूची पेश की और कहा कि खिलाफत हाउस का भूखंड इसमें शामिल है। उन्होंने निर्माण कार्य पर तुरंत रोक लगाने की मांग की। न्यायाधिकरण ने हालांकि काम पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि इस विवाद में राज्य सरकार का रुख साफ करने के लिए उसे भी पक्षकार बनाया जाना चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायाधिकरण ने मामले की अगली सुनवाई नौ अक्टूबर तय की।

वर्तमान में खिलाफत हाउस से सटी खिलाफत महाविद्यालय की इमारत में निर्माण और नवीनीकरण का काम चल रहा है। इस कार्य के कारण महाविद्यालय में पढ़ने वाली छात्राओं की कक्षाएं फिलहाल पास के ही इमामवाड़ा नगर पालिका स्कूल में चलायी जा रही हैं।

यह विवाद तब गहराया था, जब महाराष्ट्र राज्य वक्फ बोर्ड ने खिलाफत हाउस के भूखंड को लेकर एक नोटिस जारी किया था। नोटिस में जमीन को वक्फ संपत्ति बताते हुए किसी भी निर्माण के लिए अनुमति लेना अनिवार्य बताया गया था।

खिलाफत हाउस प्रबंधन ने इस नोटिस पर कड़ा एतराज जताया। प्रबंधन का साफ कहना है कि यह संपत्ति राज्य सरकार की है और वक्फ बोर्ड का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मामले में खिलाफत हाउस के ट्रस्टी व अध्यक्ष सरफराज आरजू ने एक हलफनामा दायर किया। हलफनामे में कहा गया कि ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी ने वक्फ अधिनियम 1995 के तहत खातों व अन्य जानकारियों की मांग करने वाले महाराष्ट्र राज्य वक्फ बोर्ड के नोटिस को गैर-कानूनी और उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।

कमेटी ने अपने अध्यक्ष सरफराज आरजू के जरिए जिला वक्फ अधिकारी को भेजे जवाब में 16 सितंबर के इस नोटिस को चुनौती दी है। कमेटी का तर्क है कि वक्फ अधिनियम की धारा 61 के तहत जारी नोटिस उस पर लागू नहीं होता, क्योंकि वह इंग्लिश कॉमन लॉ के तहत चैरिटी कमिश्नर के पास एक सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत है।

कमेटी ने 'महाराष्ट्र राज्य वक्फ बोर्ड बनाम यूसुफभाई चावला एवं अन्य' मामले में उच्चतम न्यायालय के 2022 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी संपत्ति को वैध वक्फ बनाने के लिए कानूनी शर्तों के तहत स्वामित्व अधिकार होना आवश्यक है।

कमेटी ने 1958 के एक दीवानी मुकदमे में बॉम्बे शहर दीवानी अदालत के 16 मई 1964 को दिए गए फैसले का भी हवाला दिया। कमेटी के अनुसार, उस अदालती आदेश के तहत ट्रस्ट के संचालन का ढांचा तय किया गया था और संपत्तियों का मालिकाना हक ट्रस्टियों के पास ही रखा गया था। इसी आधार पर कमेटी का दावा है कि इस संस्था को वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता।

लोअर मजगांव क्षेत्र स्थित शहर सर्वेक्षण संख्या 393 वाली 1408.31 वर्ग मीटर जमीन के संबंध में कमेटी ने दोहराया कि यह जमीन पूरी तरह सरकारी है। कमेटी के अनुसार, महाराष्ट्र के राज्यपाल ने मुंबई कलेक्टर के माध्यम से चार मई 2023 को लीज डीड (पट्टा) के जरिये यह जमीन ट्रस्ट को दी थी। आवश्यक अनुमतियां मिलने के बाद पुरानी इमारत को गिराकर नई इमारत का निर्माण शुरू किया गया है।

कमेटी ने 13 नवंबर 2003 की वक्फ सूची में अपना नाम शामिल किए जाने को भी चुनौती दी है। उसका कहना है कि एक दिसंबर 1997 की अधिसूचना के तहत नियुक्त सर्वे कमिश्नर ने न तो ट्रस्टियों को कोई नोटिस दिया और न ही वक्फ अधिनियम की धारा चार के तहत कोई जांच की, फिर भी एक मनगढ़ंत रिपोर्ट के आधार पर उसका नाम दर्ज कर दिया गया। धारा दो के तहत छूट के प्रावधानों का हवाला देते हुए कमेटी ने स्पष्ट किया कि वक्फ कानून उसके ट्रस्ट और संपत्तियों पर लागू ही नहीं होता।

कमेटी ने वक्फ अधिनियम की धारा 43 के तहत पंजीकरण संख्या 'एमएसबीडब्ल्यू एमयूएम 597 2025' के तहत अपने कथित रजिस्ट्रेशन को भी गैर-कानूनी बताते हुए चुनौती दी है। आरोप है कि यह पंजीकरण बिना किसी नोटिस या सुनवाई का मौका दिए मनमाने ढंग से किया गया।

कमेटी के अनुसार, वर्तमान नोटिस उन लोगों की शिकायत पर जारी किया गया है जो संपत्ति पर कब्जा करने की नीयत से उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं। कमेटी ने यह भी आरोप लगाया कि उसे उस शिकायत की प्रति तक मुहैया नहीं कराई गई।

ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी ने चेतावनी दी है कि यदि नोटिस वापस नहीं लिया गया तो वह सक्षम अदालत का रुख करेगी। कमेटी ने बताया कि वह 1989 से मुंबई विश्वविद्यालय से संबद्ध शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज चला रही है और एससीईआरटी, पुणे से संबद्ध उर्दू माध्यम का डी.एड कोर्स भी संचालित करती है। बीएमसी ने भी इमामवाड़ा में विद्यालय चलाने के लिए कमेटी को जगह दी है।

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