नयी दिल्ली , मई 27 -- कांग्रेस सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को लेकर बुधवार को गंभीर सवाल उठाए।
श्री सिंघवी ने कहा कि शीर्ष न्यायालय ने एसआईआर की संवैधानिक वैधता को स्वीकार तो किया, लेकिन फैसले ने कई नए विरोधाभास भी पैदा कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि नागरिकता तय करने का अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय जैसी "अधिकृत प्राधिकारी" के पास है। चुनाव आयोग केवल प्रशासनिक भूमिका निभा सकता है और नागरिकता विवाद होने पर मामले को संबंधित प्राधिकरण को भेजना होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आयोग के पास नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है, तो विभिन्न राज्यों में करोड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से कैसे हटाए गए।
उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में 65 लाख डिलीशन समेत कई मामलों में चुनाव आयोग ने जल्दबाजी में खामियों के साथ प्रक्रिया लागू की। राजनीतिक दलों, एनजीओ और सिविल सोसायटी के दबाव के बाद ही कई सुधार संभव हुए। उन्होंने कहा कि शीर्ष न्यायालय ने चुनाव आयोग की कमियों पर कोई सख्त टिप्पणी नहीं की।
उन्होंने एसआईआर के लिए कम समय सीमा को भी बड़ी त्रुटि बताया। बिहार में चार महीने और पश्चिम बंगाल में पांच महीने दिए गए। साथ ही उन्होंने कहा कि आधार, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेजों को नागरिकता प्रमाण नहीं मानने के बावजूद पूरी प्रक्रिया इन्हीं दस्तावेजों पर आधारित रही, जिससे "पहले निष्कासन, बाद में निर्णय" जैसी स्थिति बनी।
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