मुंबई , अगस्त 29 -- एलगार परिषद मामले के चार प्रमुख आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए मुंबई की एक विशेष अदालत ने शनिवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जमानत की शर्तों के कथित उल्लंघन के आधार पर उनकी जमानत रद्द करने की मांग की गयी थी।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि एनआईए ऐसा कोई पर्याप्त सबूत या सामग्री पेश करने में विफल रही है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है।
एनआईए ने वकील सुधा भारद्वाज, अरुण फेरेरा, तेलुगु कवि वरवर राव और कार्यकर्ता वर्नोन गोंसाल्वेस की जमानत रद्द करने के लिए अदालत का रुख किया था। एजेंसी का आरोप था कि इन चार आरोपियों ने 19 जनवरी को मुंबई प्रेस क्लब में एक बैठक में भाग लिया था, जहां कथित तौर पर 'अर्बन नक्सल' आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने पर चर्चा की गई थी। एनआईए ने तर्क दिया कि बैठक में उनकी उपस्थिति सह-आरोपियों या समान गतिविधियों में शामिल लोगों से संपर्क न करने की जमानत शर्तों का उल्लंघन है।
हालांकि, विशेष अदालत ने एनआईए की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल प्रेस क्लब के कार्यक्रम में शामिल होने से जमानत की शर्तों का उल्लंघन सिद्ध नहीं होता। अदालत के इस फैसले से हाई-प्रोफाइल मामले का सामना कर रहे चारों आरोपियों को बड़ी राहत मिली है।
उल्लेखनीय है कि एलगार परिषद मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे में आयोजित एक सम्मेलन से जुड़ा है, जिसके अगले दिन एक जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगांव में हिंसा भड़क गयी थी। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस सम्मेलन में दिये गये भड़काऊ भाषणों के तार प्रतिबंधित माओवादी संगठनों से जुड़े थे। वर्ष 2020 में इस मामले की जांच पुणे पुलिस से एनआईए को सौंपी गयी थी। सभी आरोपियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों का खंडन किया है।
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