देहरादून , अप्रैल 17 -- उत्तराखंड के देहरादून जिला अंतर्गत ऋषिकेश स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में शुक्रवार को एकीकृत कैंसर वेलनेस क्लिनिक का विधिवत शुभारंभ किया गया। इस क्लिनिक का संचालन इंटीग्रेटिव मेडिसिन एवं आयुष विभाग, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के सहयोग से करेगा।
निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) एम्स, प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने क्लिनिक का वर्चुअल शुभारंभ करने के बाद बताया कि यह क्लिनिक आधुनिक ऑन्कोलॉजी को देश की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों योग, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध और हर्बल चिकित्सा के साथ जोड़कर रोगियों और उनके परिजनों को व्यापक सहयोग प्रदान करेगा।
कार्यक्रम की शुरुआत शुद्धता, दृढ़ता और उपचार के प्रतीक पवित्र तुलसी पौधे पर जलार्पण से हुई। प्रो. डॉ. सिंह, ने इस दौरान आयुष न्यूज़लेटर "गंगा प्रवाह" (खंड 1, अंक 2) का विमोचन भी किया। उन्होंने आयुष विभाग द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना की और कैंसर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, योग, सिद्ध और हर्बल चिकित्सा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन पद्धतियों के सिद्ध लाभ हैं और इन्हें पर और अधिक गहराई से शोध की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने योग क्रियाओं के शारीरिक संरचना पर सकारात्मक प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित बताया है।
एम्स निदेशक ने कहा कि आधुनिक विज्ञान में चर्चित अवधारणाएं जैसे ई=एमसी² और क्वांटम फिजिक्स में अध्यात्मिक विचार भारतीय पारंपरिक चिकित्सा में पहले से मौजूद हैं और इन पर व्यवस्थित शोध किया जा सकता है। उन्होंने टाटा मेमोरियल अस्पताल के अध्ययन का उल्लेख भी किया, जिसमें पाया गया कि जीवनशैली में सुधार से कैंसर की प्रगति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं और रेजिडेंट डॉक्टरों को इस क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया और पारंपरिक एवं आधुनिक चिकित्सा के संगम को त्रिवेणी संगम की संज्ञा दी।
संस्थान के संकायाध्यक्ष अकादमिक प्रोफेसर डॉ. सौरभ वार्ष्णेय ने कहा कि कैंसर रोगी का उपचार अर्थात समग्र मानव के मानसिक-शारीरिक- भावनात्मक आयामों का उपचार है। उन्होंने जोर दिया कि एकीकृत पद्धति और भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली कैंसर उपचार में महत्वपूर्ण योगदान देती है। उन्होंने बताया कि आहार, योग, ध्यान, स्वस्थ्य के प्रति जागरूकता जैसी विधियां तनाव प्रबंधन और रोगी के देखभाल में अत्यंत प्रभावी हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैंसर उपचार केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि डॉक्टर और रोगी, विज्ञान और सहानुभूति, रोगी और आशा के बीच संवाद है। उन्होंने उद्धृत किया कि "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" अर्थात विजय या पराजय मन में निहित है।
डॉ. मोनिका पठानिया (विभागाध्यक्ष, आयुष एवं इंटीग्रेटिव मेडिसिन) ने नियमित इंटीग्रेटिव क्लिनिक को विशेषीकृत कैंसर वेलनेस क्लिनिक में विस्तारित करने पर विचार साझा किए। उन्होंने क्लिनिक के उद्देश्यों और कार्यप्रवाह को प्रस्तुत किया। उन्होंने रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग को इस संयुक्त उपक्रम में सबसे पहले जुड़ने के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि विभाग ने उत्साहजनक प्रतिक्रिया दी है। सेवाएं प्रारंभ में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. दीपा जोसफ की देखरेख में दी जाएंगी और शीघ्र ही अन्य विभागों तक विस्तारित की जाएंगी, जो कैंसर रोगियों का उपचार करते हैं। उन्होंने बताया कि पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं और अब समय आ गया है कि इन्हें व्यवहार में लाकर रोगी-केंद्रित देखभाल प्रदान की जाए।
इस अवसर पर कुछ संकाय सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए। ये वे लोग हैं, जो स्वयं कैंसर से ग्रसित रहे हैं और अब पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं, उन्होंने यह बताते हुए अपने अनुभव साझा किए, कि योग और एकीकृत चिकित्सा ने उन्हें कैंसर चुनौतियों का सामना करने में आत्मविश्वास और दृढ़ता दी।
कार्यक्रम में लगभग 100 से अधिक लोगों ने शिरकत की। जिनमें विभिन्न विभागों के प्रमुख, वरिष्ठ संकाय सदस्य, छात्र और शोधकर्ता शामिल थे। संचालन डॉ. श्रीलॅय मोहंती (एसएमओ, आयुष) डॉ. श्वेता मिश्र मेडिकल ऑफिसर योग, डॉ. मिरुनालिनी मेडिकल ऑफिसर सिद्धा ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रोफेसर डॉ. सत्यश्री बालिजा तथा विभिन्न विभागों के प्रमुखों ने भागीदारी की।
उल्लेखनीय है कि एम्स ऋषिकेश विकसित तकनीकों के प्रयोग से अब कैंसर का इलाज सहजता से कर रहा है। राज्य में पेट स्कैन की सुविधा वाला यह पहला सरकारी स्वास्थ्य संस्थान हैन जहां मरीजों का रिकाॅर्ड रखे जाने के साथ प्रतिवर्ष कैंसर रजिस्ट्री हो रही है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित