ऋषिकेश , अक्टूबर, 24 -- । मधुमेह केवल रक्त में शर्करा के स्तर तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि यह हृदय रोगों के जोखिम को भी गंभीर रूप से बढ़ाता है। ऐसे में समय पर जांच, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और समुचित उपचार के जरिए इसके दुष्प्रभावों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसी महत्वपूर्ण विषय पर उत्तराखंड के एम्स ऋषिकेश में शनिवार को आयोजित कार्डियो डायबेटिक सोसाइटी (सीडीएस) के सातवें वार्षिक सम्मेलन में देशभर से जुटे चिकित्सा विशेषज्ञों ने व्यापक विचार-विमर्श किया।
संस्थान की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित सम्मेलन का उद्घाटन मुख्य अतिथि डीन एकेडमिक प्रो. सौरभ वार्ष्णेय ने किया। सम्मेलन के पहले दिन शोध प्रस्तुतियों के छह अलग-अलग सत्र आयोजित किए गए, जिनमें मधुमेह, हृदय रोग, आधुनिक उपचार पद्धतियों और मरीजों की बेहतर देखभाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।
उद्घाटन सत्र में प्रो. सौरभ वार्ष्णेय ने कहा कि ऐसे शैक्षणिक सम्मेलन चिकित्सकों को नवीनतम वैज्ञानिक साक्ष्य साझा करने और उपचार की सर्वोत्तम पद्धतियों को मरीजों तक पहुंचाने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने इंसुलिन की खोज के ऐतिहासिक महत्व के साथ चिकित्सा एवं नर्सिंग देखभाल की भूमिका को भी रेखांकित किया।
मेडिसिन विभागाध्यक्ष एवं सम्मेलन के आयोजन अध्यक्ष प्रो. रविकांत ने मधुमेह को हृदय रोगों का प्रमुख जोखिम कारक बताते हुए कहा कि मधुमेह और हृदय रोगों की रोकथाम एवं उपचार के लिए समेकित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच और समय पर उपचार को इन बीमारियों के नियंत्रण का महत्वपूर्ण आधार बताया। चिकित्सा अधीक्षक प्रो. पुनीत धमीजा ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया।
सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए विशेषज्ञों ने नवीनतम शोध और चिकित्सकीय अनुभवों के माध्यम से महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। डॉ. के. बालामुरूगेशन ने जोखिम आकलन में नॉन-ग्लाइसेमिक मार्कर, डॉ. नवल विक्रम ने एडिपोसिटी-आधारित कार्डियोमेटाबॉलिक विकारों, डॉ. प्रीति ढोट ने महिलाओं में हृदय रोगों, डॉ. भरत माहेश्वरी ने बुजुर्गों के पोषण आकलन, डॉ. सच्चिदानंद तिवारी ने मधुमेह की नई दवाओं तथा डॉ. नवदीप ने नवजात मधुमेह विषय पर व्याख्यान दिए।
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