मुंबई , मई 21 -- महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग (एमएसएससी) ने मुंबई के अंधेरी पूर्व में स्थित सांताक्रूज़ इलेक्ट्रॉनिक निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र' (एसईईपीजेड़) में सड़क किनारे बने एक क्रॉस को तोड़े जाने के मामले की जांच के आदेश दिये हैं और मुंबई पुलिस तथा बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) से इसकी मौजूदा स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है।
गौरतलब है कि कुछ दिन पहले यहां के ऐतिहासिक सेंट जॉन द बैपटिस्ट चर्च के पास बने क्रॉस को कथित तौर पर दो दिनों में दो बार तोड़े जाने की घटना सामने आई थी।
एमएसएससी के उपाध्यक्ष चेतन के. देधिया ने यह आदेश दिया है। इस संबंध में ईसाई समुदाय के सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल ने मुंबई में उनसे मुलाकात की थी। पुराने चर्च परिसर के पास महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) रोड पर स्थित इस क्रॉस को कथित तौर पर तोड़-फोड़ की लगातार दो घटनाओं में नुकसान पहुंचाया गया था। इन घटनाओं के बाद सेंट जॉन द इवेंजेलिस्ट चर्च के पुजारियों ने एमआईडीसी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करायी थी। चर्च के पैरिश प्रीस्ट फादर एंथनी फर्नांडिस ने बताया था कि पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी गयी है। ईसाई समुदाय के सदस्यों ने इन घटनाओं की जांच अपराध जांच विभाग (सीआईडी) से कराने की भी मांग की है।
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग को सौंपी गई एक शिकायत में, स्थानीय समुदाय ने आरोप लगाया है कि कुछ अज्ञात लोगों ने 12 और 13 मई की दरमियानी रात को और फिर 14 मई की सुबह-सवेरे इस धार्मिक प्रतीक को नुकसान पहुंचाया।
वॉचडॉग फाउंडेशन के ट्रस्टी निकोलस अल्मेडा और एडवोकेट गॉडफ्रे पिमेंटा द्वारा हस्ताक्षरित शिकायत में कहा गया है कि पहली घटना की रिपोर्ट किए जाने के बावजूद उसी क्रॉस को फिर से निशाना बनाया गया। शिकायतकर्ताओं ने इस घटना को दोहराए जाने से रोकने में एमआईडीसी पुलिस थाने की ओर से "विफलता, लापरवाही और अक्षमता" करार दिया। शिकायतकर्ताओं ने इलाके के सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने और उसकी जांच करने, दोषियों के खिलाफ कड़ी धाराओं के तहत मामले दर्ज करने और उन किसी भी संगठित समूह की पहचान करने की मांग है, जिन पर ईसाई प्रतीकों को बार-बार निशाना बनाकर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश करने का आरोप है।
सेंट जॉन द बैपटिस्ट चर्च की स्थापना 1579 में जेसुइट मिशनरी फादर मैनुअल गोम्स द्वारा की गई थी, जिन्हें अक्सर 'सालसेट का धर्मदूत' कहा जाता है। यह चर्च 1840 तक इस क्षेत्र में कैथोलिक उपासना का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा, जब एक गंभीर महामारी के कारण वहां के निवासियों को मारोल स्थानांतरित होना पड़ा। इसके बाद, 1840 में मारोल में वर्तमान चर्च का निर्माण किया गया, जिसमें मूल संरचना के कई वास्तुशिल्प तत्वों और पवित्र कलाकृतियों को संरक्षित किया गया है।
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