तिरुवनंतपुरम , अप्रैल 01 -- कर्नाटक के ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज तथा आईटी/बीटी मंत्री प्रियांक खरगे ने बुधवार को प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 की कड़ी आलोचना करते हुए इसे "डराने-धमकाने वाला कानून" करार दिया, जो देशभर में अल्पसंख्यक संस्थानों और धर्मार्थ संगठनों के लिए खतरा है।

केपीसीसी कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में श्री खरगे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश यह विधेयक केवल विदेशी फंडिंग के विनियमन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लंबे समय से समुदाय द्वारा संचालित संस्थानों पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास है।

उन्होंने कहा कि धारा 16ए(2), 16ए(3)(बी), 16ए(6) और 14बी जैसे प्रावधान अधिकारियों को संपत्तियां फ्रीज करने, जब्त करने और यहां तक कि संस्थानों को भंग करने की शक्तियां देते हैं, जिससे स्वायत्तता और विधिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं।

श्री खरगे ने कहा, "यह विधेयक सुधार नहीं है। यह पारदर्शिता या जवाबदेही के बारे में नहीं है। यह दशकों से जनविश्वास के आधार पर खड़े किए गए अल्पसंख्यक संस्थानों, चैरिटी और सेवा नेटवर्क पर हमला है।"उन्होंने केरल की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का प्रशासन राज्य के हितों की रक्षा करने में विफल रहा है और केंद्र को बार-बार राज्य की संस्थाओं और छवि को कमजोर करने का अवसर मिला है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यह विधेयक शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़े धार्मिक संस्थानों को असंगत रूप से प्रभावित करेगा, जिससे अनाथालय, वृद्धाश्रम, स्कूल, अस्पताल और राहत केंद्र जैसे संस्थानों पर असर पड़ सकता है, जो समाज के सबसे कमजोर वर्गों की सेवा करते हैं।

उन्होंने कहा, "यह केवल कानूनी संशोधन नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक संदेश है कि समुदाय द्वारा बनाए गए संस्थानों पर नियंत्रण किसका होगा।"श्री खरगे ने विदेशी निधि को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने के सरकार के तर्क पर सवाल उठाते हुए इसके समर्थन में साक्ष्य मांगे, खासकर केंद्र सरकार के एक दशक के कार्यकाल के संदर्भ में।

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