हैदराबाद , मार्च 20 -- इंडियन स्कूल ऑफ़ बिज़नेस (आईएसबी) के भारती इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी (बीआईपीपी) ने शुक्रवार को तीन-दिवसीय 'सार्वनिक नीति डायलॉग्स (पीपीडी) 2026' की शुरुआत की।

कार्यक्रम में किसान, महिला नेता, नीति-निर्माता, शोधकर्ता और उद्योग जगत के हितधारक एक साथ आमंत्रित किया गया है, ताकि भारत की खाद्य प्रणालियों को मज़बूत बनाने पर विचार-विमर्श किया जा सके।

इस राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्देश्य मिट्टी की घटती मिट्टी की उर्वरता, किसानों की तकलीफ़ों, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और एक ही समय में भूख तथा बढ़ती मोटापे जैसी गंभीर चुनौतियों का समाधान करना है। साथ ही, यह सम्मेलन टुकड़ों में सुधार करने के बजाय एकीकृत नीतिगत कार्रवाई करने का आह्वान करता है।

महाराष्ट्र राज्य कृषि मूल्य आयोग के अध्यक्ष पाशा पटेल ने अपने संबोधन में टिकाऊ तौर-तरीकों को अपनाने की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कार्बन उत्सर्जन को कम नहीं किया गया और हरित आवरण (पेड़-पौधों) को नहीं बढ़ाया गया, तो किसानों को खाद्य उत्पादन बनाए रखने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि स्थिरता सिर्फ़ चर्चाओं तक सीमित न रहकर, ज़मीनी स्तर पर काम में बदलनी चाहिए।

इस दौरान आईएसबी के डीन प्रोफ़ेसर मदन पिल्लुतला ने अपने शुरुआती भाषण में कहा कि जैसे-जैसे यह संस्थान अपना 25वां साल मना रहा है, यह भारत की चुनौतियों को हल करने के लिए वैश्विक स्तर के शोध और स्थानीय प्रासंगिकता पर लगातार ध्यान केंद्रित कर रहा है। उन्होंने खाद्य प्रणालियों में उभरती जटिलताओं से निपटने की ज़रूरत पर प्रकाश डाला, जिसमें पर्यावरण का बिगड़ना और कुपोषण व ज़्यादा कैलोरी लेने का दोहरा बोझ शामिल है।

बीआईपीपी के कार्यकारी निदेशक एवं सम्मेलन के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर अश्विनी छतरे ने कहा कि भारत की खाद्य प्रणालियाँ काफ़ी दबाव में हैं और उन्हें कई आयामों में एकीकृत सोच की ज़रूरत है। उन्होंने बताया कि इस बातचीत का मकसद संस्कृति, बाज़ार और नीति के नज़रिए से खाद्य प्रणालियों की जाँच करना है। साथ ही इसमें अलग-अलग तरह के हितधारकों को एक साथ लाना है जिनमें नीति बनाने वाले और उन्हें लागू करने वाले से लेकर शोधकर्ता और सीधे तौर पर प्रभावित समुदाय शामिल हैं।

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