मुंबई , जुलाई 17 -- महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बहुत बड़ा भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं।

विपक्षी महाविकास अघाड़ी गठबंधन को अब तक का सबसे करारा झटका देते हुए, मराठा क्षत्रप शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अब उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ एक नया राजनैतिक गठबंधन बनाने की तैयारी में है। इस संभावित उलटफेर ने राज्य के सियासी गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार श्री पवार अपनी पार्टी का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में औपचारिक तौर पर तो शामिल नहीं होंगे। इसके बजाय, वह सत्तारूढ़ खेमे में शामिल होने के लिए श्री शिंदे की कमान वाली शिवसेना के साथ सीधा चुनावी समझौता करेगी। यह बेहद चतुराई भरा सियासी कदम राज्य के सत्ताधारी महा-गठबंधन के भीतर एक नया राजनैतिक समीकरण तैयार कर सकता है।

सत्ता के गलियारों से छनकर आ रही रिपोर्टों के मुताबिक, श्री पवार के दल के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल को महाराष्ट्र सरकार में शामिल कर उन्हें वित्त मंत्रालय की बागडोर सौंपी जा सकती है। गौरतलब है कि यह बेहद अहम मंत्रालय पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दिवंगत नेता अजीत पवार के पास था। इस नए कदम से राज्य सरकार के भीतर सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

राकांपा ( शरद पवार) के सत्ताधारी गठबंधन से चल रही अठखेलियों में तब और रंग भर गया, जब दोनों पक्षों के शीर्ष नेताओं के बीच लुका छिपी वाली बैठकों का दौर तेज हो गया। जयंत पाटिल ने दो दिन पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भेंट की थी, जबकि गुरुवार को उन्होंने और पार्टी के वरिष्ठ नेता जितेंद्र आव्हाड ने श्री शिंदे से मुलाकात की। सर्वश्री आव्हाड और श्री शिंदे की इस मुलाकात को राजनैतिक विश्लेषक बेहद खास मान रहे हैं, क्योंकि ये दोनों ही नेता ठाणे जिले से आते हैं और पारंपरिक रूप से एक-दूसरे के सियासी बैरी रहे हैं।

माना जा रहा है कि सत्ता की यह नई बिसात स्वयं श्री शरद पवार और श्री एकनाथ शिंदे के बीच हुई गुप्त मंत्रणा का अंजाम है। इस प्रस्तावित फार्मूले के तहत, श्री शरद पवार की पार्टी अपनी आजाद सियासी पहचान बनाए रखेगी, लेकिन श्री शिंदे की शिवसेना के साथ मिलकर भविष्य के चुनाव लड़ेगी। दोनों दल सीटों के बंटवारे के तहत अपने-अपने मजबूत गढ़ों में उम्मीदवार उतारेंगे और पोशीदा रूप से सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बने रहेंगे।

यह नाटकीय घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब श्री शरद पवार और दिवंगत अजीत पवार के गुटों को फिर से एक करने की कोशिशें औंधे मुंह जा गिरीं थीं। सूत्रों का कहना है कि दिवंगत अजीत पवार का खेमा पार्टी के भीतर सत्ता के किसी भी नए बंटवारे के सख्त खिलाफ था। दूसरी ओर, श्री शरद पवार का गुट सुनेत्रा पवार की रहनुमाई में काम करने को तैयार नहीं था, और यह सवाल भी उठा कि श्री शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले जैसे वरिष्ठ नेता नई पीढ़ी के नेतृत्व ढांचे के तहत कैसे काम कर सकते हैं।

इधर, भाजपा भी एक और बड़े राजनैतिक गुट के आने से सत्ता में पैदा होने वाले किसी भी उलझन से बचना चाहती है। इसीलिए सीटों के बंटवारे पर किसी भी बड़े विवाद को रोकने के लिए, शिंदे की शिवसेना और शरद पवार की पार्टी के बीच इस सीधे और अलग गठबंधन का रास्ता निकाला जा रहा है।

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