कोलकाता , अगस्त 31 -- पश्चिम बंगाल के मानवाधिकार संगठनों ने केंद्र सरकार से पत्रकार शहरियार कबीर, प्रोफेसर अबुल बरकत, वकील राणा दासगुप्ता तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता चिन्मय प्रभु के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की अपील की और कहा है कि ये लोग बंगलादेश में धार्मिक उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं।
कैंपेन अगेंस्ट एट्रोसिटीज ऑफ माइनॉरिटीज इन बंगलादेश (सीएएएमबी), ऑल इंडिया रिफ्यूजी फ्रंट, सेक्युलर मिशन और ह्यूमन राइट्स बियॉन्ड फ्रंटियर्स फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने सोमवार को आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में यह अपील की।
सीएएएमबी के सचिव मोहित राय ने कहा कि बंगलादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति दशकों से गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है और हाल के वर्षों में यह और अधिक बिगड़ी है। उन्होंने कहा, "बंगलादेश में अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न कभी समाप्त नहीं हुआ है। जिन्होंने इस उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठायी है, वे अब खुद कानूनी और अन्य प्रकार के उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं। हम केंद्र सरकार से इस मुद्दे को उठाने और उन लोगों के लिए न्याय व सुरक्षा सुनिश्चित करने का अनुरोध करते हैं जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खड़े हुए हैं।"संगठनों की ओर से प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 5 अगस्त, 2024 के राजनीतिक बदलाव के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न तेज हो गया। उन्होंने दावा किया कि 4 अगस्त से 31 दिसंबर, 2024 के बीच पांच महीनों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के 32 सदस्यों की हत्या कर दी गयी।
इस अवसर पर उपस्थित बंगलादेश ऐक्य परिषद के अध्यक्ष बप्पादित्य बसु ने कहा, "घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर हमलों, तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी की 1,906 घटनाएं हुईं। बंगलादेश में धार्मिक अल्पसंख्यक नरक में जी रहे हैं। वे सभी अत्याचार सहेंगे, नहीं तो उनके परिवारों का सफाया कर दिया जायेगा। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां किसी खास समुदाय को इतने लंबे समय से प्रताड़ित किया जा रहा हो।"संगठनों के सदस्यों ने दावा किया कि 1 जनवरी से 31 दिसंबर, 2025 तक के 12 महीनों के दौरान 61 घटनाओं में धार्मिक अल्पसंख्यकों के 66 लोग मारे गये।
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