देहरादून , जून 10 -- उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की घोषणा के क्रम में सूचना प्रौद्योगिकी, सुराज एवं विज्ञान प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा बुधवार को उत्तराखंड विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार नीति-2026 जारी कर दी गई है।
नीति का उद्देश्य राज्य में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित विकास और नवाचार को बढ़ावा देते हुए राज्य को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करना है।
राज्य में विज्ञान प्रसार के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्यरत उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत के अनुसार उत्तराखडं वर्तमान में प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन के साथ ही हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। नई नीति इन चुनौतियों के समाधान के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थानों, शोध संस्थाओं, शिक्षाविदों, उद्योगों और नवप्रवर्तकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करेगी। उनके अनुसार यह नीति महिलाओं, ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों के निवासियों, सीमांत समुदायों और दिव्यांगजनों को समान अवसर प्रदान करते हुए विज्ञान एवं नवाचार के क्षेत्र में समावेशी और समान भागीदारी सुनिश्चित करेगी।
प्रो पन्त ने बताया कि नई नीति में अनुसंधान, नवाचार और वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित करते हुए स्थानीय आवश्यकताओं एवं चुनौतियों के समाधान के लिए विज्ञान और तकनीक का प्रभावी उपयोग पर जोर दिया गया है। इसका लक्ष्य आर्थिक विकास, सामाजिक समावेशन और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए सतत विकास की दिशा में राज्य को आगे बढ़ाना है। नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य स्तर पर एक सलाहकार निकाय का गठन किया जाएगा, जो नीति के कार्यान्वयन, अनुश्रवण और मूल्यांकन का कार्य करेगा। इसके साथ ही अनुसंधान एवं नवाचार गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए विकेन्द्रीकृत संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाएगी।
महानिदेशक यूकॉस्ट ने बताया कि इस नीति के तहत राज्य, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग को मजबूत बनाने के लिए व्यापक सहयोगात्मक तंत्र विकसित किया जाएगा। राज्य सरकार के विभिन्न विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों, निजी क्षेत्र की कंपनियों और स्टार्ट-अप्स में विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (एसटीआई) इकाइयों की स्थापना सुनिश्चित करने के लिए राज्य स्तरीय समन्वय समिति का गठन भी किया जाएगा। नीति के अंतर्गत वैज्ञानिक जानकारी, शोध निष्कर्षों और संसाधनों तक सभी हितधारकों की सुगम पहुंच सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने बताया कि सार्वजनिक निधि से संचालित शोध कार्यों से प्राप्त डेटा का डिजिटल भंडारण किया जाएगा तथा इसे सभी हितधारकों तक सुरक्षित और सरल रूप से उपलब्ध कराया जाएगा। भारत सरकार की "एक राष्ट्र, एक सदस्यता" पहल के माध्यम से शोध और विज्ञान संबंधी अभिलेखागारों तक पहुंच भी उपलब्ध होगी। "आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड" की अवधारणा को साकार करने के लिए तकनीक के स्वदेशीकरण और स्थानीयकरण को विशेष प्रोत्साहन दिया जाएगा।
प्रो पन्त के अनुसार, नई नीति के तहत राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय तकनीकी समाधान विकसित किए जाएंगे तथा पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को भी आधुनिक अनुसंधान एवं नवाचार से जोड़ा जाएगा। साथ ही शैक्षणिक संस्थानों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास किया जाएगा। उन्होंने बताया कि विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे। नवीन शिक्षा नीति के अनुरूप शिक्षकों के कौशल विकास के लिए अत्याधुनिक शिक्षण-अधिगम केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे। विज्ञान संचार और जनभागीदारी को बढ़ावा देने के लिए राज्य में विज्ञान नगरी, विज्ञान केंद्र, तारामंडल, अटल टिंकरिंग लैब, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) प्रयोगशालाएं, खगोल अवलोकन संघ तथा उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने की दिशा में कार्य किया जाएगा।
महानिदेशक के अनुसार नई नीति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉकचेन, रोबोटिक्स, ड्रोन, संवर्धित वास्तविकता (एआर), आभासी वास्तविकता (वीआर) और मिश्रित वास्तविकता (एमआर) जैसी उभरती तकनीकों को विशेष महत्व दिया गया है। साथ ही अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, नैनो प्रौद्योगिकी, डिजिटल तकनीक, खाद्य-जल-ऊर्जा सुरक्षा और आपदा प्रबंधन से जुड़े अनुसंधान एवं विकास कार्यों को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि नई नीति के तहत जमीनी स्तर के नवप्रवर्तकों, वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच संवाद एवं सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके लिए कार्यशालाएं, संयुक्त शोध परियोजनाएं, फेलोशिप और छात्रवृत्तियां संचालित की जाएंगी। राज्य के वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक विशेष सहभागिता पोर्टल भी विकसित किया जाएगा।
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