नैनीताल , जुलाई 31 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करने के प्रस्ताव को लेकर विवाद गहरा गया है।
उच्च न्यायालय के अधिवक्ता कौशल साह जगती ने नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल के खिलाफ वन तथा ऐ संरक्षण अधिनियम, 1980 और वन संरक्षण नियम, 2023 के तथाकथित उल्लंघन के मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को एक औपचारिक शिकायत भेजी है।
शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी पर बिना आवश्यक केंद्रीय अनुमतियों और प्रक्रियात्मक स्वीकृतियों के आरक्षित वन भूमि पर उच्च न्यायालय परिसर के निर्माण का प्रस्ताव देने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की मांग की है।
शिकायत पत्र के अनुसार जिलाधिकारी नैनीताल द्वारा उच्च न्यायालय के स्थानांतरण के लिए प्रस्तावित की गई जगहों में शामिल आरक्षित वन भूमि पर्यावरण और वन्यजीवों के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। बताया गया है कि प्रस्तावित भूमि 'ताराई - पूर्वी वन प्रभाग' के अंतर्गत आती है, जो 'किल्पुरा-खटीमा-सुरई कॉरिडोर' और 'गोला कॉरिडोर' जैसे दो प्रमुख एशियाई हाथी गलियारों(एलीफेंट कोरिडोर) को बाधित करती है।
शिकायतकर्ता का तर्क है कि इस आरक्षित वन भूमि का गैर-वानिकी कार्यों के लिए उपयोग करना राष्ट्रीय वन नीति और वन संरक्षण नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है, जिससे लुप्तप्राय एशियाई हाथियों का अस्तित्व और अधिक खतरे में पड़ जाएगा।
इसके अलावा, शिकायत में कहा गया है कि उच्च न्यायालय का पर्वतीय क्षेत्र (नैनीताल) से मैदानी या गैर-पर्वतीय क्षेत्र में स्थानांतरण उत्तराखंड राज्य के पुनर्गठन के मूल उद्देश्यों के खिलाफ है, जिसका उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों का विकास करना था। नैनीताल से उच्च न्यायालय हटने से स्थानीय रोजगार पर गंभीर असर पड़ेगा और पहाड़ों से पलायन बढ़ेगा। यह भी तर्क दिया गया है कि उच्चतम न्यायालय ने केवल 'अवस्थापना संबंधी समस्याओं' को सुलझाने की बात कही थी, न कि वन भूमि की प्रकृति को बदलने की। ऐसे में बिना केंद्रीय वन विभाग की मंजूरी के पारित किया गया यह प्रस्ताव पूरी तरह अनुचित है और इससे राज्य के खजाने पर भी भारी बोझ पड़ेगा।
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