नैनीताल , जुलाई 20 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय को हल्द्वानी स्थानांतरित किए जाने के मामले में उच्च न्यायालय में गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गयी और अदालत ने इस प्रकरण पर निर्णय सुरक्षित रख लिया।
वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में उच्च न्यायालय को हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में स्थानांतरित किए जाने और बिना केंद्र सरकार की अनुमति के भूमि आरक्षित करने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर कई घंटों तक सुनवाई हुई। दिनभर न्यायालय में भारी गहमागहमी रही।
अदालत खचाखच भरी रही। सुनवाई के दौरान पर्वतीय राज्य की मूल अवधारणा का मुद्दा जोर-शोर से उठा, जिसमें कहा गया कि राज्य बनने का मुख्य उद्देश्य पहाड़ों का विकास था। वकीलों ने तर्क दिया कि यदि उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करना ही है, तो उसे मैदानी क्षेत्र के बजाय पहाड़ के ही किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए। मामले में याचिकाकर्ता एवं राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन शाह ने कोर्ट को अवगत कराया कि जिलाधिकारी नैनीताल द्वारा हाईकोर्ट के लिए बेल बाबा मंदिर के पास आरक्षित वन क्षेत्र की जमीन का प्रस्ताव बनाना वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा-2 का सीधा उल्लंघन है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि इस प्रकार के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यह भी कहा गया कि उच्चतम न्यायालय की रोक के बावजूद मई 2026 में जिलाधिकारी ने इस विवादित भूमि का प्रस्ताव तैयार किया। यही नहीं जिस जगह का प्रस्ताव किया गया है वह हाथी कॉरिडोर में आता है। कहा गया कि केंद्र सरकार की अनिवार्य अनुमति का मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय के 15 जुलाई 2026 के आदेश और उत्तराखंड सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना में भी उक्त भूमि को "फॉरेस्ट जमीन" ही माना गया है।
वन संरक्षण अधिनियम 1980 के कड़े प्रावधानों के तहत किसी भी आरक्षित वन क्षेत्र को अनारक्षित करने या उसके स्वरूप को बदलने का कानूनी अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास निहित है, न कि राज्य सरकार या किसी प्राधिकरणों के पास। ऐसे में बिना केंद्रीय मंजूरी के इस भूमि का हस्तांतरण पूरी तरह से नियमों के विपरीत और गैर-कानूनी है। दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए अधिवक्ताओं ने इन सभी तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय के स्थानांतरण के लिए आगे की प्रक्रिया नियमानुसार चल रही है। सरकार का पक्ष था कि जिस स्थान पर उच्च न्यायालय को स्थानांतरित किया जाना प्रस्तावित है, वह कोई हाथी कॉरिडोर नहीं है।
हालांकि, याचिकाकर्ता और अन्य अधिवक्ताओं ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब उच्चतम न्यायालय ने नैनीताल जिले में कहीं भी उपयुक्त भूमि चिन्हित करने को कहा था, तो सरकार केवल हल्द्वानी में ही इसे शिफ्ट करने पर क्यों अड़ी है, जबकि अन्य विकल्प भी मौजूद हैं। फिलहाल सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
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