कोलकाता , सितंबर 25 -- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक नये मामले में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को एकल पीठ की दी गयी राहत/संरक्षण को रद्द कर दिया। अदालत ने उन्हें जमानत मांगने के सामान्य कानूनी रास्ते अपनाने का निर्देश दिया।
मुख्य न्यायाधीश रवींद्र बी. घुगे और न्यायमूर्ति ओम नारायण राय की खंडपीठ न्यायमूर्ति सौगात भट्टाचार्य के आदेश के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। एकल पीठ ने पुलिस को एक अन्य मामले में प्रधान को 'गिरफ्तार न मानने' और उनके खिलाफ कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई न करने का निर्देश दिया था। मुख्य न्यायाधीश ने एकल पीठ के आदेश के आधार पर सवाल उठाते हुए कहा, "एकल पीठ ऐसा आदेश कैसे पारित कर सकती है? मुझे यह आदेश देखकर आश्चर्य हो रहा है।"खंडपीठ ने यह भी सवाल उठाया कि प्रधान ने अग्रिम जमानत या गिरफ्तारी के बाद नियमित जमानत की याचिका दायर क्यों नहीं की? मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानून का छात्र होने के नाते वे कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालतें छुट्टियों के दौरान भी जरूरी मामलों की सुनवाई कर सकती हैं और शनिवार या रविवार को भी कानूनी प्रक्रिया नहीं रुकती।
प्रधान के अधिवक्ता अयान भट्टाचार्य ने दलील दी कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके गुट से प्रधान की उम्मीदवारी का समर्थन करने के बाद परिस्थितियां बदल गयीं। प्रधान ने 15 सितंबर को नामांकन दाखिल किया था और उनके अधिवक्ता के मुताबिक 18 सितंबर तक कोई परेशानी नहीं थी, जब इस राजनीतिक समर्थन का एलान हुआ था।
श्री भट्टाचार्य ने न्यायालय से कहा, "उन्हें 2007 के एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है और चुनाव में अब महज कुछ ही दिन बचे हैं। कानूनी संरक्षण इसलिए मांगा गया था, ताकि वे चुनाव में भाग ले सकें।" उन्होंने यह भी तर्क दिया कि छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव से पहले इस नये मामले में जमानत लेने के लिए पर्याप्त समय नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सही तरीका जमानत के लिए अर्जी देना ही है। उन्होंने कहा, "आप चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन कानून से बचकर नहीं।" उन्होंने जोड़ा कि उम्मीदवार होने से प्रधान खास नागरिक नहीं बन जाते, कानून देश के हर नागरिक के लिए समान है।
अतिरिक्त एडवोकेट जनरल राजदीप मजूमदार के नेतृत्व में राज्य सरकार ने पक्ष रखा कि प्रधान को न्यायालय से जारी वारंट के आधार पर पिछले मामलों में गिरफ्तार किया गया था। राज्य सरकार के मुताबिक, इन मामलों में वारंट 2021 से लंबित थे और यह गिरफ्तारियां चुनाव प्रक्रिया से जुड़े निर्देशों के तहत हुई हैं। सरकार का यह भी कहना था कि पिछला प्रशासन इन पुराने मामलों को वापस लेना चाहता था।
यह विवाद 2007 के नंदीग्राम भूमि-अधिग्रहण आंदोलन के पुराने मामलों में प्रधान की गिरफ्तारी से जुड़ा है। उच्च न्यायालय ने इससे पहले लगभग दो दशक पुराने मामलों में की गयी कार्रवाई के समय पर सवाल उठाये थे।
इस बीच, प्रशासन और चुनाव आयोग के शुक्रवार को प्रधान की पत्नी अर्पिता प्रधान की प्रस्तावित जनसभा को अनुमति न दिये जाने के बाद नंदीग्राम में एक अलग राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि अनुमति के लिए आवेदन बहुत पहले जमा कर दिया गया था।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अशोक भट्टाचार्य ने कहा, "हमने नियमों का पालन करते हुए समय सीमा से बहुत पहले आवेदन किया था, लेकिन चुनाव आयोग ने बिना कोई कारण बताये अनुमति नहीं दी।"मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के जिला सचिवालय सदस्य परितोष पटनायक ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों को बैठकें और कार्यक्रम आयोजित करने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। नंदीग्राम में हालांकि भाजपा नेताओं ने इस मुद्दे को तूल न देने की बात कही है।
नंदीग्राम में छह अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं, जबकि चुनाव प्रचार चार अक्टूबर को थम जायेगा।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित