नयी दिल्ली , फरवरी 16 -- दिल्ली सरकार ने विधि शोधकर्ताओं को पूर्व से प्रभावी वेतन भुगतान संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

यह मामला अगस्त 2023 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की एक समिति के उस फैसले से पैदा हुआ है, जिसमें विधि शोधकर्ताओं के लिए महीने की सैलरी 65,000 रुपये से बढ़ाकर 80,000 रुपये करने की मंज़ूरी दी गयी थी जिसे एक अक्टूबर, 2022 से लागू करना था। इस प्रस्ताव को मुख्य न्यायाधीश की मंज़ूरी मिल गयी थी और बाद में इसे दिल्ली सरकार को भेजा गया था।

सरकार ने तीन सितंबर, 2025 को अपनी मंज़ूरी दी थी, लेकिन उसने बदला हुआ वेतन दो सितंबर, 2025 से लागू कर दिया था। प्रस्ताव के लंबित रहने के दौरान, कुछ विधि शोधकर्ताओं ने पहले की तारीख से बढ़ोतरी को लागू करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

उच्च न्यायालय ने याचिका को मंज़ूरी दे दी और निर्देश दिया कि बढ़ा हुआ मेहनताना एक अक्टूबर, 2022 से बकाया के साथ दिया जाए। इस निर्देश को अब शीर्ष अदालत में चुनौती दी गयी है।

दिल्ली सरकार ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि मुख्य न्यायाधीश के पास अदालत के स्टाफ की सेवा शर्तों से जुड़े नियम बनाने का अधिकार है, लेकिन वेतन और भत्तों से जुड़े फैसलों के लिए संविधान के अनुच्छेद 229(2) के तहत राज्यपाल की मंज़ूरी की ज़रूरत होती है, क्योंकि खर्च राज्य की समेकित निधि से किया जाता है।

सरकार ने कहा है कि पिछली तारीख तय करने से बकाया की रकम और राज्य पर आर्थिक बोझ सीधे तौर पर पड़ता है। सरकार का कहना है कि पिछली तारीख से भुगतान का आदेश देकर, उच्च न्यायालय ने राज्य को वित्तीय मंज़ूरी में अपनी संवैधानिक भूमिका का इस्तेमाल करने की इजाज़त दिए बिना एक बड़ी बिना बजट वाली देनदारी डाल दी है।

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