नयी दिल्ली , जून 30 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को आसाराम उर्फ आशुमल की उस याचिका पर राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें उन्होंने एक नाबालिग भक्त से जुड़े 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में अपनी दोषसिद्धि को बरकरार रखने वाले राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी है।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की एक अवकाशकालीन पीठ ने इस चरण पर आसाराम को अंतरिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि राज्य सरकार को सुने बिना ऐसे अनुरोध पर विचार नहीं किया जा सकता। पीठ ने हालांकि आसाराम को चिकित्सा स्थिति बिगड़ने पर तत्काल सुनवाई की मांग करने की स्वतंत्रता दी और निर्देश दिया कि वर्तमान में उन्हें दिया जा रहा उपचार जारी रहना चाहिए।

न्यायालय ने राजस्थान सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।

आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने अदालत से उनकी बढ़ती उम्र और चिकित्सा स्थिति पर विचार करने का आग्रह किया और दलील दी कि 90 वर्षीय आसाराम का इलाज चल रहा है तथा उन्हें निरंतर चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता है।

किसी भी अंतरिम राहत का विरोध करते हुए राजस्थान सरकार ने तर्क दिया कि इस मामले में एक नाबालिग का यौन उत्पीड़न शामिल है। इसके अलावा जब भी आवश्यकता हुई, आसाराम को पहले से ही पर्याप्त चिकित्सा उपचार प्रदान किया गया है।

यह मामला उन आरोपों से संबंधित है कि अगस्त 2013 में, जोधपुर में आसाराम के आश्रम में एक नाबालिग लड़की को गलत तरीके से बंधक बनाया गया था और उसे यौन उत्पीड़न तथा आपराधिक धमकी का शिकार बनाया गया था।

मुकदमे के बा, राजस्थान की एक अदालत ने आसाराम के साथ सह-आरोपी संचिता शिल्पी (एक हॉस्टल वार्डन) और शरद चंद्र (स्कूल निदेशक) को दोषी ठहराया था।

इस वर्ष मई में राजस्थान उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो) और किशोर न्याय अधिनियम के तहत बलात्कार और अन्य अपराधों के लिए आसाराम की दोषसिद्धि को बरकरार रखा था।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने आसाराम और दो सह-आरोपियों को आपराधिक साजिश और सामूहिक बलात्कार के आरोपों से बरी कर दिया था और माना था कि उन अपराधों के तत्व स्थापित नहीं हुए थे।

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