नयी दिल्ली , मई 14 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया में 'स्वतंत्रता के दिखावे' को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। न्यायालय ने टिप्पणी की कि तीन सदस्यीय चयन पैनल में प्रधानमंत्री के साथ एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री की उपस्थिति से विपक्ष के नेता (एलओओ) की भूमिका महज औपचारिकता या दिखावटी रह जाती है।
न्यायामूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक के चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) शामिल होते हैं, तो फिर सीईसी और ईसी की चयन प्रक्रिया में कोई स्वतंत्र सदस्य क्यों नहीं रखा गया है? पीठ ने जोर देकर कहा कि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता न केवल उसके वास्तविक कामकाज में, बल्कि जनता की धारणा में भी दिखनी चाहिए।
पीठ ने कहा, "आयोग का केवल स्वतंत्र होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।" शीर्ष अदालत की यह तल्ख टिप्पणियां 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यावधि) अधिनियम, 2023' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आईं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार इस बात को रेखांकित किया कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या वर्तमान व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग की आवश्यकता को पूरा करती है, विशेष रूप से तब जब स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना संविधान के मूल ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री वाले चयन पैनल के गठन पर सवाल उठाते हुए पीठ ने कहा कि इस प्रक्रिया में वास्तव में किसी भी स्वतंत्र सदस्य को शामिल नहीं किया गया है।
न्यायमूर्ति दत्ता ने उल्लेख किया कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में भी मुख्य न्यायाधीश चयन पैनल का हिस्सा होते हैं, जबकि सीबीआई मुख्य रूप से आपराधिक जांच और कानून के शासन से जुड़ी होती है। न्यायालय ने आश्चर्य जताया कि सीईसी और ईसी की नियुक्तियों में ऐसा स्वतंत्र सदस्य क्यों गायब है, जिनका सीधा संबंध देश में लोकतांत्रिक एवं चुनावी निष्पक्षता बनाए रखने से है।
जब अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने स्वीकार किया कि व्यावहारिक रूप से पैनल में शामिल कैबिनेट मंत्री आमतौर पर प्रधानमंत्री से अलग राय नहीं रखते, तो न्यायालय ने कहा कि इससे चयन प्रक्रिया का नियंत्रण प्रभावी रूप से कार्यपालिका (सरकार) के हाथ में आ जाता है। उच्चतम न्यायालय ने विपक्ष के नेता को शामिल करने के औचित्य पर भी सवाल उठाया, यदि निर्णय हमेशा सरकार के पक्ष में 2:1 के बहुमत से ही होने हैं।
अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि न्यायालय केवल इस आशंका पर किसी कानून को अमान्य नहीं ठहरा सकती कि इसके तहत आयुक्तों की नियुक्ति स्वतंत्र नहीं होगी। उन्होंने कहा कि 2023 में 'अनूप बरनवाल' मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ का फैसला केवल एक अंतरिम व्यवस्था थी, जो संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक के लिए ही प्रभावी थी।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित