नयी दिल्ली , मई 27 -- उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग की ओर से किये गये मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता को बरकरार रखते हुए बुधवार को कहा कि यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए जरूरी है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 तथा उसके तहत बनाए गये नियमों के अनुसार आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार प्राप्त है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया, जिनमें निर्वाचन आयोग द्वारा पिछले वर्ष जून में बिहार में एसआईआर कराने संबंधी जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई थी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा सुनाए गये फैसले में कहा गया कि जब कानून स्वयं चुनाव आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार देता है, तो केवल इस आधार पर इस प्रक्रिया को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि यह नियमित पुनरीक्षण की सामान्य प्रक्रिया के प्रत्येक पहलू का पूरी तरह पालन नहीं करती।

उच्चतम न्यायालय ने कहा, "हमारी सुविचारित राय में यह विवादित एसआईआर 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' और उसके नियमों की जगह नहीं लेता है, बल्कि, यह धारा 21(3) द्वारा निर्धारित सटीक कानूनी सीमाओं के भीतर अनुच्छेद 324 के तहत दिए गए संवैधानिक आदेश में नयी जान डालता है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों से बढ़कर कोई कार्य किया है।"शीर्ष अदालत ने कहा कि एसआईआर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक आवश्यकता को आगे बढ़ाता है। न्यायालय के अनुसार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। वे मूल रूप से मतदाता सूची की सटीकता और विश्वसनीयता पर आधारित होते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव है।

पीठ ने कहा कि विस्तृत विचार के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने अथवा संशोधित करने की प्रक्रिया में नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच करने का अधिकार है।

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