(पंकज शर्मा से)रायपुर , जुलाई 16 -- देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित ईंधन (ई20) के उपयोग को लेकर सामने आए एक महत्वपूर्ण उपभोक्ता विवाद में रायपुर जिला उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग ने मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड और उसके अधिकृत डीलर को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है।
आयोग ने निर्देश दिया है कि कंपनी 45 दिनों के भीतर उपभोक्ता को उसी मॉडल की ई20 अनुकूल नई कार उपलब्ध कराए, अन्यथा वाहन की कीमत करीब 20.50 लाख रुपये सहित पंजीयन, बीमा एवं अन्य मदों में खर्च की गई राशि लौटाए। साथ ही मानसिक प्रताड़ना के लिए एक लाख रुपये तथा मुकदमे में खर्च हुए 10 हजार रुपये का भुगतान भी करे।
यह मामला रायपुर निवासी डॉ. प्रेमराज देबता द्वारा दायर शिकायत याचिका से जुड़ा है, जिसका फैसला 14 जुलाई को आया और उसकी प्रति गुरुवार को मिली।
डॉ. देबता ने जून 2024 में मारुति सुजुकी की नेक्सा डीलरशिप से ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस खरीदी थी। उनके अनुसार वाहन खरीदते समय डीलर ने कार का निर्माण दिसंबर 2023 का बताया, जबकि आयोग के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों से पता चला कि वाहन का निर्माण जनवरी 2023 में हुआ था।
शिकायत याचिका के अनुसार डॉ. देबता प्रतिदिन लगभग 150 से 200 किलोमीटर की यात्रा करते हैं, इसलिए उन्होंने हाइब्रिड वाहन का चयन किया। लगभग पांच माह बाद 11 नवंबर 2024 को वाहन के डैशबोर्ड पर इंजन में खराबी आयी और कार बंद हो गई। अधिकृत सर्विस सेंटर ने प्रारंभिक जांच में मिलावटी ईंधन की आशंका जताते हुए ईंधन टैंक खाली कराया, जिसमें नीचे सफेद रंग का पदार्थ जमा मिला। इसके बाद पेट्रोल पंप तथा कंपनी से शिकायत की गई, हालांकि ईंधन जांच में पेट्रोल पंप ने अपनी गुणवत्ता सही बताई।
मामले में यह भी सामने आया कि कंपनी ने बाद में स्वीकार किया कि पहली बार फ्यूल सिस्टम पूरी तरह साफ नहीं हो सका था। दोबारा सफाई के दौरान भी टैंक, पाइपलाइन और फिल्टर में सफेद परत एवं तरल पदार्थ मिला। इसके बावजूद वाहन में पुनः इंजन खराबी की शिकायत आयी और ईवी मोड ने कार्य करना बंद कर दिया। कंपनी ने ई-मेल के माध्यम से इंजन बदलने की लागत लगभग 5.30 लाख रुपये बताते हुए इसे वारंटी के दायरे से बाहर बताया। वाहन की मरम्मत के बाद भी डीलरशिप परिसर से पेट्रोल भरवाने के लगभग 10 किलोमीटर बाद कार फिर बंद हो गई। इस बार भी ईंधन टैंक में दही जैसी सफेद परत और तरल पदार्थ मिलने की बात सामने आई। इसके बाद डॉ. देबता ने नई कार अथवा पूरी राशि लौटाने की मांग की, जिसे कंपनी ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद मार्च 2025 में उपभोक्ता आयोग में शिकायत दायर की।
सुनवाई के दौरान पेट्रोल के नमूनों की जांच एसजीएस लैब में कराई गई। रिपोर्ट में ईंधन में एथेनॉल की मौजूदगी की पुष्टि हुई तथा यह भी पाया गया कि टैंक के निचले हिस्से में एथेनॉल अलग होकर सफेद परत के रूप में जमा था। रिपोर्ट के अनुसार ईंधन ई20 श्रेणी का था, लेकिन एथेनॉल पृथक्करण के कारण उसकी प्रभावी मात्रा लगभग छह से सात प्रतिशत रह गई थी। आयोग ने अपने निर्णय में माना कि संबंधित वाहन ई20 ईंधन के अनुरूप नहीं था, फिर भी उपभोक्ता को बेचा गया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित