चेन्नई , मई 23 -- प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तमिलनाडु सरकार को पत्र लिखकर वरिष्ठ द्रमुक नेता एवं पूर्व मंत्री अनीता राधाकृष्णन के खिलाफ कथित धन शोधन मामले के आरोपों के तहत धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों के तहत जांच करने की अनुमति मांगी है।

ईडी ने अपने पत्र में अवैध वित्तीय लेन-देन से जुड़े कथित उल्लंघनों का हवाला देते हुए जांच को आगे बढ़ाने के लिए औपचारिक मंज़ूरी का अनुरोध किया है। एजेंसी ने दावा किया है कि अनियमित धन हस्तांतरण एक बड़े धन शोधन मामले का हिस्सा हैं, जिसकी जांच अभी उसके द्वारा की जा रही है।

वर्तमान द्रमुक विधायक अनीता राधाकृष्णन के खिलाफ यह मामला तमिलनाडु सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) द्वारा 2006 में दर्ज किए गए 'आय से अधिक संपत्ति' के मामले से जुड़ा है। इस मामले में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से कहीं अधिक 2.07 करोड़ रुपये की संपत्ति जमा की थी। ईडी ने इसी आधार पर 2020 में धनशोधन की जांच शुरू की और उसके बाद पूर्व द्रमुक मंत्री से जुड़ी 1.26 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया। ये संपत्तियां तूतीकोरिन, मदुरै और चेन्नई में स्थित थीं। एजेंसी ने बाद में धनशोधन के आरोपों के तहत और भी संपत्तियां कुर्क कीं, जिससे कुर्क की गई कुल संपत्ति का मूल्य बढ़कर लगभग 2.44 करोड़ रुपये हो गया।

श्री राधाकृष्णन ने 2002-2006 के दौरान तत्कालीन द्रमुक सरकार में आवास और शहरी विकास मंत्री के रूप में कार्य किया था। 2006 में उनके खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया था, जिसमें उन पर अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से कहीं अधिक, 2.07 करोड़ रुपये की संपत्ति जमा करने का आरोप लगाया गया था। इसके बाद उन पर धनशोधन के आरोप भी लगाए गए, जिसके चलते उनके ठिकानों पर तलाशी ली गई और उनकी संपत्तियों को कुर्क किया गया।

ईडी ने पूर्व मंत्री के खिलाफ जांच की मंजूरी के लिए पिछली द्रमुक सरकार को कई पत्र लिखे थे लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था। इसलिए अब केंद्रीय एजेंसी ने उनके खिलाफ जांच शुरू करने के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू किए हैं। इसी क्रम में एजेंसी ने मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार को एक पत्र भेजा है।

यह घटनाक्रम एजेंसी की कुछ दिन पहले शुरू हुई कार्रवाई के बीच आया है, जिसमें उसने राज्य सरकार को एक ऐसा ही पत्र भेजकर, कथित 'नौकरी के बदले नकद' घोटाले के मामले में द्रमुक के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री वी. सेंथिल बालाजी पर मुकदमा चलाने और उनसे पूछताछ करने की मंज़ूरी मांगी थी। एजेंसी ने अपनी अभियोजन शिकायत के साथ सहायक सबूत भी पेश किए थे, और इस बात पर ज़ोर दिया था कि पीएमएलए के तहत किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए सरकार की मंज़ूरी अनिवार्य है।

यह अनुरोध कुछ प्रक्रियागत घटनाक्रमों के बाद किया गया था, जिसमें राज्यपाल के माध्यम से किया गया एक पिछला प्रयास राज्य सरकार को भेज दिया गया था, जिससे मंज़ूरी देने का फैसला करने की ज़िम्मेदारी अब राज्य सरकार पर आ गई थी।

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