चेन्नई , अक्टूबर 24 -- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने शनिवार को बताया कि दिसंबर 2024 में प्रक्षेपित स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (स्पेडेक्स्स) के दोनों उपग्रहों ने स्वायत्त तरीके से जुड़ने और कम प्रभाव वाली डॉकिंग तकनीक का सफल प्रदर्शन करने के बाद 12 अक्टूबर 2026 को पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश किया।
इसरो के अनुसार, मिशन के दौरान दोनों अंतरिक्ष यानों ने ऊर्ध्वाधर और रेडियल डॉकिंग, संयुक्त नियंत्रण, बिजली हस्तांतरण, अलग होने तथा पेलोड संचालन सहित सभी प्रमुख उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया। दोनों उपग्रहों ने एक-दूसरे के चारों ओर चक्कर लगाने की प्रक्रिया का भी सफल प्रदर्शन किया।
अंतरिक्ष एजेंसी ने बताया कि स्पेडेक्स-ए और स्पेडेक्स-बी उपग्रहों का ईंधन समाप्त होने के बाद वे अपनी कक्षाओं में धीरे-धीरे नीचे आए और 12 अक्टूबर को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया। चार और 11 अक्टूबर को आए दो मध्यम भू-चुंबकीय तूफानों ने उनकी कक्षाओं के क्षय की प्रक्रिया को तेज कर दिया।
इसरो ने कहा कि 30 दिसंबर 2024 को पीएसएलवी-सी60 मिशन के जरिए 470 किलोमीटर की वृत्ताकार कक्षा में स्पेडेक्स का सफल प्रक्षेपण एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। मिशन में दो छोटे उपग्रहों के माध्यम से अंतरिक्ष में स्वायत्त तरीके से जुड़ने और डॉकिंग की महत्वपूर्ण तकनीकों का प्रदर्शन किया गया।
एजेंसी ने बताया कि सावधानीपूर्वक मिशन प्रबंधन और संचालन के कारण दोनों उपग्रहों से अंतिम टेलीमेट्री संकेत प्राप्त होने तक उनकी स्थिति सामान्य बनी रही।
इसरो के अनुसार, स्पेडेक्स-ए ने 12 अक्टूबर को भारतीय समयानुसार रात करीब 10 बजकर 18 मिनट पर दक्षिण प्रशांत महासागर के ऊपर पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया। स्पेडेक्स-बी ने उसी दिन भारतीय समयानुसार 13 अक्टूबर की सुबह करीब पांच बजकर छह मिनट पर उत्तरी अटलांटिक महासागर के ऊपर वायुमंडल में प्रवेश किया।
स्पेडेक्स मिशन पीएसएलवी से प्रक्षेपित दो छोटे अंतरिक्ष यानों की मदद से अंतरिक्ष में डॉकिंग तकनीक प्रदर्शित करने वाला कम लागत का प्रौद्योगिकी मिशन है। यह तकनीक भारत की भविष्य की अंतरिक्ष योजनाओं, जैसे चंद्रमा पर भारतीय मिशन, चंद्रमा से नमूने वापस लाने और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएएस) के निर्माण एवं संचालन के लिए महत्वपूर्ण है।
इसरो ने कहा कि जब एक ही मिशन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कई रॉकेट प्रक्षेपणों की आवश्यकता होती है, तब अंतरिक्ष में डॉकिंग तकनीक बेहद उपयोगी होती है। इस मिशन के जरिए भारत अंतरिक्ष में डॉकिंग तकनीक प्रदर्शित करने वाला दुनिया का चौथा देश बना।
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