बेंगलुरु , जून 13 -- देश के वैज्ञानिक अब ऐसी अत्याधुनिक अंतरिक्ष तकनीक विकसित कर रहे हैं जिससे भविष्य के चंद्र लैंडर चंद्रमा की सतह पर 200 दिनों तक सक्रिय रह सकेंगे। यह चंद्रयान-3 लैंडर के केवल 14 दिनों के परिचालन जीवनकाल के मुकाबले एक बहुत बड़ी छलांग होगी, जो देश की दीर्घकालिक चंद्र अन्वेषण महत्वाकांक्षाओं को पूरी तरह बदल देगी।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन ने शनिवार को इस बड़ी योजना का खुलासा करते हुए बताया कि इसरो ने परमाणु ऊर्जा विभाग के साथ मिलकर एक साझा प्रयास शुरू किया है, ताकि चंद्रमा के मिशनों में सबसे कठिन चुनौती यानि चांद की बेहद सर्द और लंबी रातों में जीवित रहने की समस्या का स्थायी समाधान खोजा जा सके।

इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने यहाँ आयोजित छठे 'सीएसआईआर-राइज कॉन्क्लेव' को संबोधित करते हुए कहा कि चंद्रयान-3 की सफलता ने जहां एक ओर भारत की तकनीकी क्षमताओं का लोहा मनवाया, वहीं दूसरी ओर चंद्रमा की सतह पर निरंतर संचालन हासिल करने की बची हुई चुनौतियों को भी रेखांकित किया। उन्होंने याद दिलाया कि 23 अगस्त 2023 को भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफलतापूर्वक उतरने वाला दुनिया का पहला और इकलौता देश बना था, लेकिन विक्रम लैंडर का जीवनकाल केवल 14 दिनों का था क्योंकि वह बिजली पैदा करने के लिए पूरी तरह सूर्य की रोशनी पर निर्भर था।

इसके बाद के अगले 14 दिनों की चंद्र रात्रि के दौरान, बिजली की अनुपस्थिति और अत्यधिक कम तापमान के कारण लैंडर के भीतर के इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम जीवित नहीं रह सके। इसी समस्या को दूर करने के लिए इसरो और डीएई अब उन्नत कृत्रिम हीटिंग सिस्टम पर काम कर रहे हैं, जो जमा देने वाली चंद्र रातों के दौरान अंतरिक्ष यान को सुरक्षित रखेंगे। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो भारतीय लैंडर 14 दिनों के बजाय 100 से 200 दिनों तक चांद पर जीवित रहकर बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रयोग कर सकेंगे और डेटा जुटा सकेंगे।

इसरो प्रमुख ने कहा कि यह पहल भारत के वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बढ़ रहे आपसी सहयोग की संस्कृति को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि इसरो और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने हाल ही में व्यापक विमर्श के बाद तकनीकी सहयोग के लिए 40 से अधिक क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें से पहले चरण में 17 परियोजनाओं को मंजूरी भी दे दी गई है। इसके अलावा, पहले स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन 'गगनयान' के तहत इसरो ने अंतरिक्ष चिकित्सा में अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए 'श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी' के साथ एक समझौता किया है। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के 'एक्सिओम मिशन' में भारत की भागीदारी के बाद, माइक्रो-ग्रेविटी से जुड़े प्रयोगों के लिए इसरो ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग के साथ भी हाथ मिलाया है।

श्री वी. नारायणन ने राष्ट्र निर्माण में नवाचार और स्टार्टअप्स की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि मजबूत उद्योग भागीदारी के दम पर पिछले एक दशक में भारत का वैज्ञानिक इकोसिस्टम तेजी से फैला है, जिसके चलते दिसंबर 2025 तक भारत दो लाख से अधिक स्टार्टअप्स के साथ दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक बन चुका है। उन्होंने जानकारी दी कि अंतरिक्ष कार्यक्रम अब तक लगभग 105 लॉन्च व्हीकल मिशन और करीब 135 सैटेलाइट मिशन सफलतापूर्वक पूरे कर चुका है।

इसरो प्रमुख ने इस नई चंद्र तकनीक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रेखांकित भारत के दीर्घकालिक अंतरिक्ष विजन से जोड़ते हुए कहा कि भारत साल 2040 तक चांद पर अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने और एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को उतारने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। उन्होंने 'विकसित भारत 2047' के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि कोई भी संस्थान अकेले ऐसे बड़े लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकता; यह सामूहिक प्रयास, वैज्ञानिक उत्कृष्टता और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता से ही संभव होगा।

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