नयी दिल्ली , अक्टूबर 29 -- राजधानी में विज्ञान एवं उभरते प्रौद्योगिकी क्षेत्रों पर आयोजित 'इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव' (ईएसटीआईसी) , 2026 सम्मेलन गुरुवार को यहां विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह के समापन संबोधन के साथ सम्पन्न हुआ जिसमें उन्होंने प्रौद्योगिकी के माध्यम से चहुमुखी परिवर्तन के लिए काम किये जाने का आह्वान किया।

भारत मंडपम में 27-29 अक्टूबर तक भारत मंडपम में आयोजित इस सम्मेलन में देश विदेश के प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, तकनीकी क्षेत्र के उद्यमी, स्टार्टअप प्रवर्तक तथा वैज्ञानिक शामिल हुए जिसमें कुछ नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी थे । सम्मेलन का उद्घाटन प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

डॉ सिंह ने वैज्ञानिक खोजों से आगे बढ़कर उनके व्यावहारिक उपयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि भारत के अनुसंधान एवं नवाचार तंत्र की सफलता का आकलन अब राष्ट्रीय विकास और विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण में उसके ठोस योगदान के आधार पर तेजी से किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के परिणामोन्मुख विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि अगले तीन वर्षों के लिए स्पष्ट और मापनीय लक्ष्य निर्धारित करना महत्त्वपूर्ण है। इससे देश की प्रगति का आकलन करने और उसकी दीर्घकालिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

समापन सत्र में भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय के. सूद; वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग के सचिव तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की महानिदेशक डॉ. एन. कलाइसेल्वी; जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे; पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. श्रीनिवास कुमार तुम्माला; तथा कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। वैज्ञानिकों, वरिष्ठ अधिकारियों, उद्योग प्रतिनिधियों, स्टार्टअप्स और अन्य हितधारकों ने भी इस सत्र में भाग लिया।

इस दौरान ईएसटीआईसी 2026 से प्राप्त प्रमुख सिफारिशों पर प्रस्तुतियाँ दी गयी। इसके बाद दो महत्त्वपूर्ण दस्तावेज जारी किये गये और अंत में केंद्रीय मंत्री डॉ. सिंह ने समापन संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि ईएसटीआईसी को धीरे-धीरे एक ऐसे वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त वैज्ञानिक मंच के रूप में विकसित होना चाहिए, जहाँ शोधकर्ता, शिक्षाविद और नवप्रवर्तक सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसर तलाशें। उन्होंने कहा कि ऐसा मंच अपने वैज्ञानिक कार्यक्रम की गुणवत्ता और विश्वसनीयता के आधार पर अपनी पहचान स्थापित करेगा।

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