दरभंगा , जुलाई 15 -- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के प्राध्यापक प्रो. कमलानंद झा ने बुधवार को कहा कि इतिहास और साहित्य का संबंध आत्मीय होने के साथ-साथ अत्यंत जटिल भी है।ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग द्वारा बुधवार को 'इतिहास और साहित्य का अंतर्संबंध' विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधितकरते हुए प्रो. कमलानंद झा ने औपनिवेशिक ऐतिहासिक दृष्टि की सीमाओं को बताते हुए साहित्य और साहित्य के इतिहास पर इसके प्रभावों और दुष्प्रभावों को विस्तार से बताया। इतिहास और साहित्य के रिश्ते को आत्मीय एवं जटिल बताते हुए उन्होंने कहा कि अधिकांश साहित्यकारों की ऐतिहासिक रचनाओं में कल्पना इतनी हावी हो जाती है कि वो न तो इतिहास रह पाता है और न ही बेहतर साहित्य ही बन पाता है।

प्रो. झा ने हिन्दी साहित्य के इतिहास को अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंदों का इतिहास कहा। उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में विकसित 'नव्य इतिहास शास्त्र' साहित्य को इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में स्वीकार करता है। इतिहास केवल राजा-महाराजाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि 'हिस्ट्री फ्रॉम बिलो' यानी आम जनजीवन का इतिहास भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

प्रो. झा ने औपनिवेशिक इतिहास-दृष्टि की सीमाओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसका प्रभाव साहित्य और साहित्य के इतिहास-लेखन पर भी पड़ा। उन्होंने कहा कि अनेक ऐतिहासिक साहित्यिक कृतियों में कल्पना का इतना अधिक समावेश हो जाता है कि वे न तो इतिहास की कसौटी पर खरी उतरती हैं और न ही उत्कृष्ट साहित्य बन पाती हैं।उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंद्वों का इतिहास बताते हुए महाकवि विद्यापति की 'पुरुषपरीक्षा', 'लिखनावली' और 'कीर्तिलता' पर गंभीर एवं व्यापक शोध की आवश्यकता पर बल दिया।

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