इटावा , जुलाई 6 -- उत्तर प्रदेश के इटावा स्थित जमुनापारी प्रजनन प्रक्षेत्र में संक्रमण फैलने से पिछले एक माह में 42 जमुनापारी बकरियों की मौत हो गई है। इससे राज्य सरकार की 77 लाख रुपये की प्रजनन एवं संरक्षण योजना पर संकट गहरा गया है। पशुपालन विभाग के अनुसार, मृत बकरियों के कारण अब तक करीब 29.40 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में जमुनापारी नस्ल के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रजनन प्रक्षेत्र ने मार्च माह में इटावा और औरैया के पशु मेलों से 110 जमुनापारी बकरियां खरीदी थीं। प्रत्येक बकरी की कीमत 70 हजार रुपये थी, जिस पर कुल 77 लाख रुपये खर्च किए गए थे। जून माह में खरीदी गई बकरियों में खांसी, सांस लेने में तकलीफ और चारा छोड़ने जैसे लक्षण दिखाई देने लगे। धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती गई और पिछले 30 दिनों में 42 बकरियों की मौत हो गई। फिलहाल पांच अन्य बकरियों की हालत गंभीर बनी हुई है।

संक्रमण के कारणों की जांच के लिए मथुरा, लखनऊ और रायबरेली से पशु विशेषज्ञों एवं चिकित्सकों की टीम इटावा पहुंची। प्रारंभिक जांच में माइकोप्लाज्मा संक्रमण समेत अन्य बीमारियों की आशंका जताई गई है। हालांकि अंतिम कारणों का पता जांच रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा।

प्रजनन प्रक्षेत्र के प्रभारी अखिलेश कुमार ने बताया कि गंभीर रूप से बीमार बकरियों को अलग बाड़े में रखा गया है ताकि संक्रमण अन्य पशुओं तक न फैले। उनका नियमित उपचार किया जा रहा है। संक्रमण से बचाव के लिए चिकित्सक और कर्मचारी भी मास्क एवं सुरक्षा उपकरण पहनकर ही प्रक्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं।

प्रजनन प्रक्षेत्र के पशु चिकित्सक डॉ. अतुल कुमार ने बताया कि मृत बकरियों का पोस्टमार्टम कराया गया है। प्रारंभिक जांच में संक्रमण की पुष्टि के संकेत मिले हैं। विशेषज्ञ टीम पूरे मामले की जांच कर रही है और अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।

संयुक्त निदेशक डॉ. डी.के. मिश्रा ने बताया कि बकरियों की लगातार हो रही मौत की सूचना उच्च अधिकारियों को दे दी गई है। विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उपचार और संक्रमण नियंत्रण के सभी आवश्यक उपाय किए जा रहे हैं।

जमुनापारी बकरी देश की प्रमुख दुग्ध एवं मांस उत्पादक नस्लों में मानी जाती है। इसकी मांग देश के साथ-साथ इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश समेत कई देशों में है। इटावा के चकरनगर क्षेत्र को इस नस्ल का प्रमुख प्रजनन क्षेत्र माना जाता है और यहां से बड़ी संख्या में व्यापारी देश-विदेश के बाजारों के लिए इन बकरियों की खरीद करते हैं।

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