बागपत , अगस्त 11 -- कंधे पर कांवड़, पैरों में लंबी यात्रा की थकान और मन में बाबा पुरा महादेव के जलाभिषेक का संकल्प। जब कोई शिवभक्त श्री परशुरामेश्वर महादेव मंदिर पहुंचता है तो उसके लिए केवल दर्शन ही महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि यह अहसास भी मायने रखता है कि उसकी आस्था और भावनाओं को समझने वाला कोई अपना यहां मौजूद है।

पुरा महादेव मंदिर के प्रधान पीठाधीश्वर एवं मुख्य पुजारी पंडित जय भगवान शर्मा की सेवा परंपरा इसी भावना को केंद्र में रख कर आगे बढ़ रही है। उनके लिए मंदिर की व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि बाबा के दरबार में आने वाला श्रद्धालु यहां से कैसी अनुभूति लेकर लौटता है।

पं. जय भगवान शर्मा करीब चार दशक से मंदिर सेवा से जुड़े हैं। उनके परिवार की कई पीढ़ियां भी इस सेवा परंपरा को आगे बढ़ाती रही हैं। लंबे अनुभव ने उन्हें मंदिर की परंपराओं से गहराई से जोड़ा है और साथ ही शिवभक्तों की भावनाओं को करीब से समझने का अवसर दिया है।

कांवड़िये की थकान हो, बुजुर्ग श्रद्धालु की परेशानी या जलाभिषेक के दौरान उमड़ने वाली भीड़, हर परिस्थिति में श्रद्धालु की आस्था और सुविधा को प्राथमिकता देना मंदिर सेवा की मूल भावना बनी हुई है।

पुरा महादेव में मंदिर की सेवा केवल गर्भगृह तक सीमित नहीं है। शशिकांत, बिजेंद्र, नितिन शर्मा, रोहित शर्मा, ध्रुव शर्मा, आशुतोष शर्मा 'गुड्डू भाई', आयुष, अश्वनी और आदित्य शर्मा समेत अनेक समर्पित सेवादार वर्षभर मंदिर की व्यवस्थाओं में जुटे रहते हैं।

मंदिर में सेवा करने वाले व्यक्ति को केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि महादेव की सेवा में लगे परिवार के सदस्य के रूप में देखा जाता है। मुख्य पुजारी स्वयं सेवादारों के कामकाज और उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हैं। यही अपनापन मंदिर की सेवा व्यवस्था को अलग पहचान देता है।

पुरा महादेव की बढ़ती पहचान के साथ अब मंदिर क्षेत्र में विकास की नई तस्वीर भी दिखाई दे रही है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने वर्ष 2024 में पुरा महादेव को हेरिटेज श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव की राष्ट्रीय पहचान दी थी। इसके बाद प्रदेश सरकार की योजनाओं के माध्यम से मंदिर क्षेत्र के विकास और सौंदर्यीकरण की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। काशी विश्वनाथ की तर्ज पर पुरा महादेव मंदिर कॉरिडोर विकसित किए जाने की दिशा में प्रयास जारी हैं।

जिला प्रशासन की ओर से शुरू किया गया 'जीरो वेस्ट महोत्सव' फाल्गुनी महाशिवरात्रि से श्रावणी कांवड़ मेले तक पहुंच चुका है। इसके तहत फूलों और पूजा सामग्री का सम्मानपूर्वक उपयोग, सिंगल यूज प्लास्टिक से बचाव और कचरे को संसाधन में बदलने पर जोर दिया जा रहा है।

खराब चप्पलों से मैट तैयार करने और पूजा के फूलों से अगरबत्ती बनाने जैसी पहल के माध्यम से श्रद्धालुओं को संदेश दिया जा रहा है कि भक्ति के साथ प्रकृति का सम्मान और आस्था के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है।

श्रावणी कांवड़ मेले के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में शिवभक्त पुरा महादेव पहुंच रहे हैं। इसके साथ ही धाम की पहचान भी व्यापक हो रही है। यहां आने वाला श्रद्धालु केवल जलाभिषेक ही नहीं करता, बल्कि ऐसे धाम का अनुभव लेकर लौटता है जहां परंपरा जीवित है, सेवा निरंतर है और व्यवस्था श्रद्धालु-केंद्रित है।

पं. जय भगवान शर्मा का मानना है कि मंदिर में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल दर्शनार्थी नहीं, बल्कि इस पावन धाम की विरासत का हिस्सा है। सेवा, सम्मान और सामाजिक सहभागिता को वे महादेव की भक्ति का ही विस्तार मानते हैं।

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