नयी दिल्ली , सितंबर 01 -- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव और जर्मनी के पर्यावरण मंत्री कार्स्टन श्नाइडर ने मंगलवार को चौथे भारत-जर्मन पर्यावरण मंच की बैठक के दौरान अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग को लेकर एक संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किये, जिससे आर्द्रभूमियों के संबंध में वैज्ञानिक समझ मजबूत होने के साथ ही उनके बेहतर प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।

श्री यादव ने इस मौके पर कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान, प्रदूषण और संसाधनों की कमी जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एकीकृत और सहयोगात्मक समाधान जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि भारत का विकास अनुभव दर्शाता है कि पर्यावरणीय संरक्षण और आर्थिक विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं तथा भारत अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के तहत की गई प्रतिबद्धताओं को समय से पहले लगातार पूरा कर रहा है।

उन्होंने कहा कि देश की चक्रीय अर्थव्यवस्था में 2050 तक दो हजार अरब डॉलर से अधिक का बाजार मूल्य पैदा करने और करीब एक करोड़ रोजगार सृजित करने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि इस्पात, सीमेंट और रसायन जैसे ऊर्जा-गहन क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए नवाचार, स्वच्छ ऊर्जा, संसाधन दक्षता, उपयुक्त नीतिगत ढांचे और नई उत्पादन प्रक्रियाओं की आवश्यकता होगी।

श्री श्नाइडर ने सौर पैनलों और पवन टर्बाइनों के विस्तार के साथ नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की तेज प्रगति की सराहना करते हुए कहा कि भारत दुनिया का रोल मॉडल बन रहा है। उन्होंने कहा कि भारत भविष्य का देश है, जहां प्रगति की मजबूत गति के साथ युवा आबादी में नवाचार की प्रेरक भावना है।

उन्होंने कहा कि भारत और जर्मनी के संबंधों की नींव मजबूत है और दोनों देश इस वर्ष राजनयिक संबंधों की स्थापना के 75 वर्ष मना रहे हैं। उन्होंने जलवायु अनुकूलन और आर्द्रभूमि संरक्षण में सहयोग बढ़ाने के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि दोनों देश संयुक्त परियोजनाएं विकसित करेंगे तथा ज्ञान और अनुभव साझा करेंगे।

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