तिरुवनंतपुरम , अक्टूबर 25 -- केरल की राजधानी स्थित बीआरआईसी-राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (आरजीसीबी) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे नए रास्ते की पहचान की है जिसके जरिए निमोनिया फैलाने वाले जीवाणु (बैक्टीरिया) से उत्पादित विष (टॉक्सिन) एक कोशिका से दूसरी कोशिका में फैल सकता है। यह प्रक्रिया संक्रमण के दौरान ऊतकों को होने वाले नुकसान को और अधिक बढ़ा सकती है।
'जर्नल ऑफ एक्स्ट्रासेलुलर वेसिकल्स' में प्रकाशित यह अध्ययन उजागर करता है कि क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की रक्षा के लिए बना शरीर का कोशिकीय मरम्मत तंत्र अनजाने में स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी के उत्पादित शक्तिशाली टॉक्सिन 'न्यूमोलीसिन' को पड़ोसी कोशिकाओं में स्थानांतरित करने में मदद कर सकता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जब कोशिकाएं टॉक्सिन के कारण होने वाले नुकसान पर प्रतिक्रिया देती हैं, तो वे झिल्ली युक्त छोटी संरचनाएं छोड़ती हैं, जिन्हें 'एक्स्ट्रासेलुलर माइक्रोवेसिकल्स' कहा जाता है।
ये वेसिकल्स जैविक रूप से सक्रिय न्यूमोलीसिन को अपने भीतर बनाए रख सकते हैं और इसे आस-पास की कोशिकाओं तक पहुंचा सकते हैं, जिससे टॉक्सिन से होने वाले नुकसान का एक अतिरिक्त मार्ग बन जाता है।
न्यूमोलीसिन छिद्र बनाने वाला एक ऐसा टॉक्सिन है, जो कोशिका झिल्लियों में कोलेस्ट्रॉल से जुड़ता है और उसमें ऐसे सुराख पैदा कर देता है, जिससे उनकी संरचनात्मक अखंडता प्रभावित होती है। जब कोशिकाएं इस टॉक्सिन के निचले स्तर के संपर्क में आती हैं, तो वे एक्स्ट्रासेलुलर वेसिकल्स को बाहर निकालकर अपनी प्लाज्मा झिल्ली के प्रभावित हिस्सों को हटाकर नुकसान को सीमित करने का प्रयास करती हैं।
आरजीसीबी की टीम ने पाया कि न्यूमोलीसिन कोशिकीय कचरे के रूप में खत्म होने के बजाय इन झिल्ली से बने माइक्रोवेसिकल्स में केंद्रित हो जाता है और जैविक रूप से सक्रिय बना रहता है। यह टॉक्सिन-युक्त वेसिकल्स बाद में पड़ोसी कोशिकाओं के साथ परस्पर क्रिया कर सकते हैं और उनकी झिल्ली को अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर), हैदराबाद के डॉ. जगन्नाथ मंडल और उनके सहयोगियों के साथ मिलकर किए गए आणविक सिमुलेशन से एक नए तंत्र का पता चला है, जिसके माध्यम से वेसिकल से जुड़े न्यूमोलीसिन का एक खुला हिस्सा प्राप्तकर्ता कोशिका झिल्ली में लिपिड के साथ जुड़ता है। यह परस्पर क्रिया झिल्ली के मुड़ने और पतले होने को बढ़ावा देती है और झिल्ली के भीतर पानी के प्रवेश को आसान बनाती है।
इस प्रक्रिया में शामिल प्रमुख अमीनो एसिड में बदलाव करने से झिल्ली का विरूपण (डिफॉर्मेशन) काफी हद तक कम हो गया, जो टॉक्सिन की पारंपरिक छिद्र-निर्माण गतिविधि से परे इस तंत्र की भूमिका का समर्थन करता है। शोधकर्ताओं ने मानव कोशिकाओं का उपयोग कर भी इस प्रक्रिया का प्रदर्शन किया।
न्यूमोलीसिन के संपर्क में आने वाली मोनोसाइटों के छोड़े गए माइक्रोवेसिकल्स ने टॉक्सिन को मानव परिधीय रक्त प्रतिरक्षा कोशिकाओं में स्थानांतरित कर दिया, जिससे उनकी झिल्ली प्रभावित हुई और कोशिकाओं की मृत्यु दर बढ़ गई।
भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलुरु के डॉ. सोमनाथ दत्ता और उनके सहयोगियों के साथ मिलकर किए गए क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी विश्लेषण से झिल्ली अंतःक्रिया के स्थलों पर न्यूमोलीसिन के सटीक स्थान का पता लगाने में मदद मिली।वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. कार्तिक सुब्रमण्यम ने कहा कि इन निष्कर्षों ने मेजबान कोशिका की अपनी मरम्मत प्रणाली के एक अप्रत्याशित परिणाम को उजागर किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि क्षतिग्रस्त कोशिका की सुरक्षा के लिए बनी प्रक्रिया प्रभावी रूप से न्यूमोलीसिन को एक अन्य झिल्ली-सक्रिय रूप में पुनर्गठित कर सकती है, जिससे टॉक्सिन-युक्त माइक्रोवेसिकल्स पड़ोसी कोशिकाओं के साथ क्रिया कर शुरुआती प्रभावित कोशिका से आगे भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
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