नयी दिल्ली , अक्टूबर 15 -- केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव रंजना चोपड़ा ने भाषा संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी पर ज़ोर देते हुए कहा है कि जनजातीय समुदायों में कल्याणकारी पहलों की पहुंच और प्रभावी कार्यान्वयन में भाषा के महत्व पर प्रकाश डाला।

श्रीमती चोपड़ा ने जनजातीय भाषाओं पर कार्य समूह की पहली बैठक में कहा कि आदि वाणी में व्यापक भाषा भंडार के रूप में विकसित होने की क्षमता है, जो चिकित्सकों और प्रशासकों के लिए एक अनुवाद उपकरण के रूप में शुरू हुई थी। इसमें पाठ्य सामग्री, प्राथमिक पुस्तकें, शब्दकोश और सामुदायिक कहानियां शामिल होंगी। उन्होंने प्रारंभिक वर्षों में सीखने की कमियों को दूर करने के लिए मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा के महत्व पर भी बल दिया और संस्थानों और विद्वानों द्वारा पहले से किये गये कार्यों को एक साझा मंच पर लाने का आह्वान किया, ताकि प्रयासों की पुनरावृत्ति से बचा जा सके।

जनजातीय भाषाओं के प्रलेखन के लिए कार्यसूची पहल के संदर्भ को प्रस्तुत करते हुए संयुक्त सचिव ने जनजातीय समुदायों की समृद्ध भाषाई विविधता और उनकी भाषाओं के प्रलेखन एवं संरक्षण की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने कार्य समूह के लिए प्रस्तावित रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें जनजातीय भाषाओं का राष्ट्रीय आधारभूत स्तर, अनुसंधान एवं शोध, डिजिटल प्रलेखन एवं भाषा प्रौद्योगिकी, मौखिक परंपराओं एवं सांस्कृतिक संसाधनों का समुदाय-आधारित प्रलेखन, बहुभाषी शिक्षा एवं शिक्षण सामग्री तथा जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई), विश्वविद्यालयों एवं अन्य संस्थानों के बीच साझेदारी शामिल हैं।

बैठक भाषा समिति के अध्यक्ष पद्मश्री चामु कृष्ण शास्त्री और साहित्य अकादमी के पूर्व सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव सहित देश भर के प्रख्यात भाषाविदों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और सामुदायिक भाषा विशेषज्ञों ने भाग लिया।

मंत्रालय द्वारा गठित इस कार्य समूह में केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल), दिल्ली, धारवाड़ और कानपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), तेजपुर विश्वविद्यालय, मणिपुर विश्वविद्यालय, असम विश्वविद्यालय, सिक्किम विश्वविद्यालय, लुप्तप्राय भाषाओं के लिए भाषा संस्थान, विविधता और नवाचार परिषद (सीओडीआईएन) और भाषा समिति सहित अन्य प्रमुख संस्थानों के सदस्य शामिल हैं। यह कार्य समूह देश भर में जनजातीय भाषाओं के प्रलेखन, संरक्षण, अनुसंधान और संवर्धन के प्रयासों का मार्गदर्शन करेगा।

यह बैठक जनजातीय भाषाओं के प्रलेखन, डिजिटल संरक्षण और प्रचार के लिए समन्वित प्रयासों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसमें आदि वाणी को भाषाई अनुसंधान, प्रौद्योगिकी, शैक्षिक संसाधनों और समुदाय-नेतृत्व वाली पहलों को जोड़ने वाले एक राष्ट्रीय मंच के रूप में परिकल्पित किया गया है।

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