झाबुआ , फरवरी 20 -- मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ में आगामी 24 फरवरी से आदिवासियों का उल्लास पर्व भगोरिया शुरु होगा।

आदिवासी समुदाय का प्रसिद्ध पर्व भगोरिया विशेष सांस्कृतिक महत्व रखता है। इसे भगोरिया, भोंगरिया, हाट-बाजार, प्रणय पर्व और भगौर जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। यह पर्व मस्ती, उल्लास, नाच-गान, ढोल-मांदल की थाप, बांसुरी की मधुर धुन और रंग-बिरंगी परंपराओं से सराबोर होता है। भगोरिया का अर्थ केवल एक मेले से नहीं, बल्कि फसलों के पकने की खुशी, टेसू के फूलों की चमक, महुआ की महक, ताड़ी की मादकता और होली के रंगों के स्वागत से भी जुड़ा है। यह आदिवासी समाज के लिए अपनी संस्कृति, परंपराओं और रीति-रिवाजों को जीवंत रूप में मनाने का महत्वपूर्ण अवसर है।

भगोरिया, झाबुआ, अलीराजपुर, धार और बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में लगने वाले साप्ताहिक हाट-बाजारों का ही विशेष रूप है। होली से एक सप्ताह पूर्व लगने वाले हाट "भगोरिया हाट" कहलाते हैं। शिवरात्रि पर लगने वाले हाट "शिवरात्रिया हाट", उसके बाद "गुलालिया हाट" और होली के बाद लगने वाले बाजार "उजाड़िया हाट" के नाम से जाने जाते हैं। होली के बाद जब कई आदिवासी काम की तलाश में अन्य क्षेत्रों की ओर पलायन कर जाते हैं, तब बाजारों की रौनक कम हो जाती है, इसलिए उन्हें उजाड़िया कहा जाता है।

भगोरिया हाट-बाजारों को लेकर आदिवासी समाज में वर्षभर उत्साह बना रहता है। चाहे वे कितनी भी दूर रोज़गार के लिए गए हों, भगोरिया से पहले अपने गांव लौट आते हैं-जैसे पक्षी संध्या ढलते ही अपने घोंसलों में लौट आते हैं। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, महिलाएं-सभी इस पर्व में भाग लेने को उत्साहित रहते हैं। एक माह पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बुजुर्ग ढोल कसते हैं, वाद्ययंत्रों की सफाई होती है, युवा बांसुरी की धुन साधते हैं और युवतियां नए वस्त्र व आभूषण जुटाने में लग जाती हैं।

भगोरिया को लेकर कई प्राचीन कथाएं और लोककथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि आदिवासी राजाओं के समय मेलों का आयोजन होता था, जहां युवक-युवतियां अपने जीवनसाथी का चयन करते थे। वे एक-दूसरे को रंग लगाकर या पान खिलाकर प्रेम का इज़हार करते और सहमति होने पर साथ चले जाते थे। बाद में परिवारों की सहमति से विवाह संपन्न होता था। इसी परंपरा के कारण इसे "भगोरिया" कहा जाने लगा। एक मान्यता यह भी है कि "भग" का संबंध भगवान शिव से और "गौर" का संबंध माता पार्वती से जोड़ा जाता है। आदिवासी समाज भगवान शिव को बाबा देव के रूप में मानता है, इसलिए भी इस नाम का संबंध शिव-पार्वती से माना जाता है।

जब खेतों में गेहूं, चना और कपास की फसलें लहलहाती हैं, तब यह पर्व खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक बन जाता है। नवयुवतियों का आकर्षक परिधान और श्रृंगार विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। मेले में झूले, चकरी, शरबत, माजम, सेव-भजिया, पान की दुकानें और विभिन्न लोककलाएं वातावरण को जीवंत बना देती हैं।

समय के साथ भगोरिया का सामाजिक ही नहीं, राजनीतिक महत्व भी बढ़ा है। विभिन्न राजनीतिक दल यहां रैलियां निकालते हैं और अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। ढोल-मांदल की टोलियां, साफा बांधकर सम्मान समारोह और जनसंपर्क के कार्यक्रम इस दौरान आम हो गए हैं। प्रदेश के मंत्री, विधायक और मुख्यमंत्री तक इस पर्व में शिरकत करते नजर आते हैं। देश-विदेश से पर्यटक, पत्रकार और शोधकर्ता भी इस अनूठी परंपरा को देखने पहुंचते हैं।

प्रदेश सरकार ने इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इसे पर्व का दर्जा दिया है। पर्यटन विभाग भी इसे बढ़ावा देने के प्रयास कर रहा है। जिला प्रशासन मेले में टेंट, माइक, जागरूकता शिविर और पेयजल की व्यवस्था करता है। यहां आने वाले लोग दाल-पानिये और ताड़ी जैसे स्थानीय व्यंजनों का स्वाद भी लेते हैं।

हालांकि भगोरिया आनंद और उल्लास का पर्व है, लेकिन कभी-कभी पुरानी रंजिशों के कारण विवाद की स्थिति भी बन जाती है। बढ़ते आवागमन और भारी भीड़ के चलते दुर्घटनाओं की आशंका भी रहती है। ताड़ी और शराब के अधिक सेवन से भी घटनाएं हो जाती हैं। ऐसे में प्रशासन और पुलिस के लिए सुरक्षा व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बन जाती है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित