शिमला , मार्च 09 -- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के एक अनुमान के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में रिक्टर पैमाने पर आठ की तीव्रता का भूकंप आने पर लगभग 1.6 लाख लोगों की मौत हो सकती है और करीब 11 लाख लोग घायल हो सकते हैं।

एनडीएमए ने ' आपदा परिदृश्य अनुमान ' के आधार पर यह आशंका व्यक्त की है। एजेंसी ने आगामी एक अप्रैल 1905 के विनाशकारी कांगड़ा भूकंप के 121वर्ष पूरे होने पर लोगों को इस तरह की आपदाओं के बारे में जागरूक बनाने का का निर्णय लिया है, जो हिमालयी क्षेत्र में दर्ज की गई सबसे विनाशकारी भूकंपीय घटनाओं में से एक थी। इस आयोजन का उद्देश्य नागरिकों को इस क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता की याद दिलाना और भविष्य के भूकंपों के प्रति तैयारी को बढ़ावा देना है।

वर्ष 2011 की जनगणना (68.56 लाख की आबादी) पर आधारित इस अनुमान के अनुसार, यदि राज्य में इतना बड़ा भूकंप आता है, तो लगभग 2.3 प्रतिशत आबादी अपनी जान गंवा सकती है, जबकि लगभग 16 प्रतिशत लोग घायल हो सकते हैं।

यह चिंताजनक अनुमान ऐसे समय में आया है जब भारतीय मानक ब्यूरो (बीआएस) ने दिसंबर 2025 में जारी अद्यतन राष्ट्रीय भूकंपीय जोखिम मानचित्र के तहत पूरे हिमाचल प्रदेश को नए बनाए गए 'सीस्मिक जोन-छह' (भूकंपीय क्षेत्र-छह) में रखा है। यह देश की सबसे अधिक भूकंपीय जोखिम वाली श्रेणी है।

यह नया वर्गीकरण हिमालयी क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैले तीव्र टेक्टोनिक तनाव को दर्शाता है, जहाँ भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। पिछले भूकंपीय मानचित्र के तहत, हिमाचल प्रदेश जिलों की भूगर्भीय भिन्नताओं के आधार पर जोन चार (उच्च जोखिम) और जोन पांच (बहुत उच्च जोखिम) के बीच विभाजित था। हालाँकि, संशोधित मानचित्र अब सभी जिलों को समान रूप से जोन छह में रखता है, जो राज्य की अत्यधिक संवेदनशीलता को उजागर करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि संशोधित वर्गीकरण भूकंप-रोधी निर्माण, आपदा तैयारी और जन जागरूकता पर अधिक जोर देने की मांग करता है। हिमालय के संवेदनशील इलाकों में राजमार्गों, सुरंगों, जलविद्युत परियोजनाओं और शहरी विस्तार से बड़े भूकंप के दौरान बढ़ते जोखिम की चिंता लगातार बनी हुई है।

अधिकारियों ने जोर देकर कहा है कि संभावित पीड़ितों की संख्या को कम करने के लिए भूकंप-रोधी भवन निर्माण संहिता का कड़ाई से पालन, सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम, मॉक ड्रिल और बेहतर प्रारंभिक प्रतिक्रिया प्रणाली जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।

एजेंसी के ताजा अनुमान उस आपदा के पैमाने की याद दिलाते हैं जो समय रहते उचित निवारक उपाय न किए जाने पर भारत के सबसे संवेदनशील पहाड़ी राज्यों में से एक में घटित हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि चार अप्रैल, 1905 को कांगड़ा में आए भूकंप की तीव्रता लगभग 7.8 मापी गई थी, जिसने तड़के कांगड़ा घाटी को हिलाकर रख दिया था। यह भूकंप करीब 6-7 किलोमीटर की कम गहराई पर उत्पन्न हुआ था और इसका संबंध 'मेन हिमालयन थ्रस्ट' (एमएचटी) के साथ हुई हलचल से था, यह वही प्रमुख टेक्टोनिक सीमा है जहाँ भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराती है।

भूकंपीय रिकॉर्ड बताते हैं कि उस भूकंप ने कांगड़ा जिले के कई हिस्सों में खतरनाक हलचल पैदा की थी। तीव्र झटकों के कारण पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर इमारतें ढह गईं, जिससे विशेष रूप से कांगड़ा, धर्मशाला, पालमपुर और आसपास की पहाड़ी बस्तियाँ प्रभावित हुईं। ऐतिहासिक अनुमानों के अनुसार, तब 20,000 से अधिक लोगों की जान गई थी, जबकि लगभग 1,00,000 घर और सार्वजनिक संरचनाएं नष्ट या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थीं।

भूवैज्ञानिक 1905 के कांगड़ा भूकंप को हिमालयी क्षेत्र में जमा हो रहे भारी टेक्टोनिक तनाव का परिणाम मानते हैं। आज भी, पश्चिमी हिमालय के बड़े हिस्से सात या उससे अधिक तीव्रता के भूकंप के प्रति संवेदनशील हैं।

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