अलवर , जनवरी 26 -- कभी जिंदगी एक ऐसे मोड़ पर थी कि जब छोटे थे, तो अपने पिता के साथ घर-घर जाकर शिवजी के भजन और महाभारत कालीन भगवानों के दोहे गाकर आटा मांग कर लाते और अपना पेट भरते थे।

राजस्थान में अलवर के गफरुद्दीन आटा मांगकर जीवन यापन करने से लेकर अब जो मकाम हासिल किया उसके पीछे उनका कठोर संघर्ष है। रविवार को भारत सरकार द्वारा पद्म श्री अवार्ड की घोषणा में जब अलवर के गफरुद्दीन का नाम आया तो अलवर के लोक कलाकारों में खुशी की लहर दौड़ गयी। अलवर के मेवात का एक महान वाद्य यंत्र भपंग वादन को भारत में जन-जन तक पहुंचाने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने वाले गफरुद्दीन मेवाती जोगीकरीब 60 देश में अपनी धूम मचा चुके हैं।

श्री गफरुद्दीन मेवाती वर्ष 1978 में अलवर में आ गये थे। यह मूलतः भरतपुर जिले के रहने वाले थे, जो वर्तमान में डीग जिले में है। कभी सपनों में भी नहीं सोचा था कि पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा, हालांकि अपनी इस कला के लिए इन्हें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सहित जिला स्तर ,राजस्थान और केंद्र स्तर पर कई पुरस्कार मिले। कला अकादमी भी द्वारा इन्हें पुरस्कार पुरस्कृत किया गया, लेकिन पदम श्री अवार्ड की घोषणा होना एक सबसे बड़ा सुखद अनुभव रहा।

उन्होंने बताया कि मोदी सरकार आने के बाद ही यह पता चला कि पद्म श्री कोई अवार्ड होता है, क्योंकि पहले कभी हमारे जैसे कलाकारों को अवार्ड मिला नहीं था, इसलिए जानकारी में नहीं था। उन्होंने बताया कि जब प्रधानमंत्री ने उन्हें अवार्ड दिया था उसे वक्त बॉलीवुड के काफी अभिनेता भी मौजूद थे। भगवान शिव के डमरू से तैयार किये गये जिस वाद्य यंत्र भपंग को यह पुश्तैनी परम्परानुसार बजाते आ रहे हैं। उन्हीं शिव भगवान की आराधना और भजनों ने उन्हें पद्म श्री अवार्ड तक पहुंचा दिया। इनका पुत्र शाहरुख मेवाती जोगी भी आठवीं पीढ़ी का है, जो भपंग बजा रहा है।

गफरुदीन के पुत्र शाहरुख खान मेवाती जोगी एवं उनके छोटे बच्चे भी भपंग बजाते हैं। शाहरुख ने मेवात संस्कृति पर पीएचडी की हुई है। भपंग के साथ महाभारत को मेवात क्षेत्र में पांडव कड़े के रूप में गाया एवं बजाया जाता है। पांडव अज्ञातवास के दौरान जब अलवर के विराटनगर क्षेत्र में पहुंचे थे। तो उस पूरे प्रसंग को भी महाभारत में शामिल किया गया है और उसका भी पांडव कड़े के रूप में गाया जाता है। साथ ही बृज, मेवाती शैली के लोक दोहे एवं लोक गीत देश विदेश के मंच पर प्रस्तुत किए हैं। जिनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी ख्याति मिली है।

गफरुदीन को राजस्थान सरकार, संगीत कला अकादमी, नयी दिल्ली से अवार्ड मिल चुका है। इसके अलावा इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया कनाडा पेरिस दुबई सहित 60 से ज्यादा देशों में ये लोग अपने भपंग वादन की प्रस्तुति पेश कर चुके हैं। साथ ही लंदन में एलिजाबेथ सहित कई बड़े कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। उन्होंने बताया कि पद्मश्री मिलना ऐसे साबित हो रहा है जैसे सुबह कोई मजदूर मजदूरी करने जाता है और शाम को उसे मजदूरी का पैसा मिलता है जो खुशी के भाव होते हैं वही खुशी आज मिल रही है। यूं तो कई बार सम्मानित किया गया, लेकिन पद्म श्री अवार्ड पाना एक सबसे बड़ी सफलता रही । वर्ष 2016 तक गफरुद्दीन मेवाती पदम श्री के बारे में नहीं जानते थे। पद्म श्री के बारे में जानने लगे, तो इन्होंने आवेदन किया। पिछले तीन वर्षों से वह लगातार आवेदन कर रहे थे। उनका उस वक्त खुशी का ठिकाना नहीं रहा दिल्ली गृह मंत्रालय से अवार्ड देने की फोन पर जानकारी मिली।

उन्होंने बताया, " मैं चार वर्ष का था तब अपने पिताजी के साथ यह भपंग बजाता था। अलवर शहर की कोई गली कोई घर ऐसा नहीं छोड़ा, जहां हर घर से आटा लेकर न आये हों। शाम को इस आटे से रोटी बनती थी। उसे खाकर अपने जीवन यापन करते थे। पेट पालने का और कोई साधन नहीं था।"भपंग के बारे में उन्होंने बताया कि ज्यादातर हम महाभारत कालीन दोहों को इसमें गुणगान करते हैं। इसके अलावा भर्तृहरि जी के शतक या उनके दोहे को गाकर वादन करते हैं यह अलग ही तरीके का वादन है।

अब 68 बसंत देख चुके गफरुद्दीन मेवाती अलवर की टाइगर कॉलोनी में रहते हैं। साधारण सा घर है, लेकिन अब यह घर किसी लोकप्रिय व्यक्ति का घर बन गया है। जब से मीडिया में अवार्ड देने की घोषणा हुई है तब से उनके घर पर बधाइयां देने वालों का तांता लगा हुआ है। खुद राजस्थान सरकार के मंत्री और अलवर शहर विधायक संजय शर्मा ने भी उनको बधाई दी।

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