रांची , अक्टूबर 30 -- झारखंड के भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आईसीएआर-आईआईएबी), रांची द्वारा अनुसूचित जाति उपयोजना एवं जनजातीय उपयोजना के अंतर्गत संस्थान परिसर में 'खेत बचाओ अभियान-सह-कृषि इनपुट वितरण कार्यक्रम' का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य किसान-वैज्ञानिक संपर्क को सुदृढ़ करना, वैज्ञानिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना, धान की कटाई के बाद खाली पड़ी भूमि (राइस फॉलो क्षेत्र) का प्रभावी उपयोग कर फसल सघनता बढ़ाना तथा उन्नत कृषि तकनीकों, एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल और प्रत्यक्ष बीजित धान के प्रति किसानों में जागरूकता पैदा करना था।
कार्यक्रम में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं, फ्रैंकलिन एल. खोबुंग, संयुक्त सचिव, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम के दौरान अतिथियों ने संस्थान के फार्म-बी स्थित एकीकृत कृषि प्रणाली इकाई का भ्रमण किया तथा किसानों के साथ संवाद किया। इस अवसर पर पौधरोपण कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। अतिथियों ने एकीकृत कृषि प्रणाली के विभिन्न घटकों का अवलोकन किया। इसके पश्चात उन्होंने प्रत्यक्ष बीजित धान प्रदर्शन इकाई का भी भ्रमण किया तथा संस्थान द्वारा प्रोत्साहित की जा रही नवोन्मेषी कृषि तकनीकों एवं पद्धतियों की सराहना की।
औपचारिक कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के गायन, दीप प्रज्ज्वलन एवं आईसीएआर गीत के साथ हुआ। डॉ. वी. पी. भदाना, संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) ने अतिथियों का स्वागत किया तथा संस्थान की उपलब्धियों एवं संचालित अनुसंधान गतिविधियों पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर डॉ. सुजय रक्षित, निदेशक, आईसीएआर-आईआईएबी ने अपने संबोधन में वर्ष 2026 के खरीफ एवं रबी मौसम के दौरान संचालित खेत बचाओ अभियान की प्रगति एवं उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान का लक्ष्य इस अभियान के माध्यम से 5,000 से अधिक किसानों तक पहुंचना है। अभियान के अंतर्गत किसानों को बैटरी चालित स्प्रेयर, सब्जी किट, सरसों, मटर एवं गेहूं की उन्नत किस्मों के बीज, नैनो यूरिया तथा नैनो डीएपी जैसे विभिन्न कृषि इनपुट वितरित किए गए हैं। इन पहलों से झारखंड के पांच जिलों के किसानों को लाभ मिलने की उम्मीद है। इससे कृषि उत्पादकता बढ़ाने, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने तथा धान की कटाई के बाद खाली पड़ी भूमि के बेहतर उपयोग में सहायता मिलेगी।
अपने संबोधन में श्री खोबुंग ने किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों की दिशा में मार्गदर्शन देने में खेत बचाओ अभियान जैसी पहलों के महत्व पर बल दिया। उन्होंने मृदा परीक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए आईसीएआर संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों तथा राज्य सरकार के विभागों से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के व्यापक प्रचार-प्रसार एवं किसानों के बीच इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जागरूकता गतिविधियों को तेज करने का आग्रह किया।
उन्होंने झारखंड में जैविक एवं प्राकृतिक खेती मिशन के महत्व पर भी प्रकाश डाला, जिसके अंतर्गत योजना के प्रावधानों के अनुसार क्रमशः तीन एवं दो वर्षों के लिए Rs.5,000 तथा Rs.4,000 प्रति एकड़ की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
श्री ठाकुर ने अपने संबोधन में पिछले कई दशकों से रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध एवं अत्यधिक उपयोग के कारण कृषि भूमि की मृदा गुणवत्ता में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, जैविक आदानों एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया तथा खेत बचाओ अभियान को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।
मंत्री श्री ठाकु ने आगे कहा कि भारत सरकार द्वारा किसानों के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं एवं सहायता तंत्र शुरू किए जाने के बावजूद, जागरूकता की कमी और योजनाओं तक सीमित पहुंच के कारण अनेक किसान अभी भी कृषि संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने आईसीएआर संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों तथा राज्य सरकार की एजेंसियों से अपनी प्रसार गतिविधियों को और सुदृढ़ करने तथा सरकारी योजनाओं एवं कृषि तकनीकों का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचाने का आग्रह किया।
उन्होंने विशेष रूप से जैविक एवं टिकाऊ कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए नियमित मृदा परीक्षण की आवश्यकता पर बल दिया तथा कृषि प्रसार से जुड़े कर्मियों को किसानों के मृदा परीक्षण में सक्रिय सहयोग देने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम के अंतर्गत किसान गोष्ठी (किसान-वैज्ञानिक संवाद) का भी आयोजन किया गया। इसमें किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने तथा जैविक खाद, गोबर की खाद एवं अन्य पर्यावरण अनुकूल पोषक स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देने के प्रति जागरूक किया गया। गोष्ठी के दौरान पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में साइलेज के उपयोग पर भी चर्चा की गई। साथ ही, दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य एवं टिकाऊ कृषि उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए जैविक एवं प्राकृतिक खेती पद्धतियों को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया गया।
कार्यक्रम में 450 से अधिक किसान एवं महिला किसानों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त जनप्रतिनिधियों एवं विभिन्न विभागों के अधिकारियों की सहभागिता भी रही, जो कृषि समुदाय एवं अन्य हितधारकों की सक्रिय भागीदारी को दर्शाती है।
किसान गोष्ठी के पश्चात अतिथियों ने संस्थान के नवनिर्मित मुख्य प्रशासनिक भवन का निरीक्षण किया। इस दौरान संस्थान के निदेशक एवं वैज्ञानिकों ने संस्थान की अनुसंधान, शैक्षणिक एवं प्रसार गतिविधियों की जानकारी दी। कार्यक्रम के अंत में डॉ. के. के. कृष्णानी, संयुक्त निदेशक (शिक्षा) ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित