तिरुवनंतपुरम , सितंबर 22 -- दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) और ऐसी दूसरी प्रक्रियाओं को वापस लिया जाना चाहिए, जो ऋण न चुकाने वाली बड़ी कंपनियों को बकाया रकम का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा चुकाकर बैंक की भारी देनदारियों को निपटाने की इजाज़त देते हैं।

यह बात यहां केनरा बैंक स्टाफ यूनियन (सीबीएसयू) के 17वें राष्ट्रीय सम्मेलन पर आयोजित एक सेमिनार में वक्ताओं ने कही।वक्ताओं ने यह मांग सीबीएसयू द्वारा अपने 17वें राष्ट्रीय सम्मेलन के हिस्से के तौर पर यहां बैंक एम्प्लॉइज़ फेडरेशन ऑफ इंडिया (बीईएफआई) सेंटर में आयोजित "भारतीय बैंकिंग पर हेयरकट का असर" विषय पर एक सेमिनार में उठायी गयी।

बीईएफआई के अखिल भारतीय अध्यक्ष एस एस अनिल ने कहा कि 2016 में खराब घोषित ऋण में सुधार के मकसद से लाए गए आईबीसी ने असल में बड़े कॉर्पोरेट उधारकर्ताओं को मूल कर्ज के एक छोटे हिस्से पर निपटारा करके भारी देनदारियों से बचने का मौका दिया है।

उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के संस्थापक और भाजपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य सुभाष चंद्रा के मामले का ज़िक्र करते हुए कहा कि 22,006 करोड़ रुपये की ऋण देनदारी को सिर्फ़ छह करोड़ रुपये से कुछ ज़्यादा रकम चुकाकर निपटा दिया गया। उन्होंने कहा कि असल में यह लगभग 22,000 करोड़ रुपये का 'हेयरकट' था, और ऐसे हेयरकट सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए बट्टे खाते के आंकड़ों में नहीं दिखते हैं।

उन्होंने कहा कि सरकारी बट्टे खाते के आंकड़ों में ऐसे रिण निपटान को शामिल न करने से बैंकों को हुए नुकसान और बैंकिंग प्रणाली पर इसके असर का सही अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है।सम्मेलन में यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लगाने के प्रस्तावित कदम की भी आलोचना की गई। वक्ताओं ने कहा कि इससे आम ग्राहकों और व्यापारियों पर बुरा असर पड़ सकता है, जबकि सरकारें कॉर्पोरेट्स को कई तरह की छूट और फ़ायदे दे रही हैं।

ऑल केरल बैंक रिटायरिज़ फ़ोरम के ज़िला सचिव एस श्रीकुमार, केनरा बैंक रिटायरिज़ फ़ोरम के उपाध्यक्ष ए एस अजित और बैंक टेम्पररी एम्प्लॉइज़ फ़ेडरेशन के ज़िला सचिव के मणिकंदन ने भी सेमिनार को संबोधित किया।

सीबीएसयू के राज्य सचिव के हरिकुमार ने बैठक की अध्यक्षता की जबकि उपाध्यक्ष के जी सुनीलकुमार ने सभा का स्वागत किया।

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