मस्कट , जनवरी 14 -- भारत और ओमान के बीच प्राचीन नौवहन संबंधों की याद को सजीव करने के लिये भारतीय नौसेना द्वारा विशेष प्राचीन तकनीक से तैयार की गयी पाल नौका आईएनएसवी कौंडिन्य 18 दिन की समुद्री यात्रा के बाद ओमान के सुल्तान कबूस बंदरगाह पहुंच गयी।

आईएनएसवी कौंडिन्य के आधिकारिक एक्स अकाउंट से जारी एक पोस्ट में इसकी पुष्टि करते हुए कहा गया, "कई दिनों तक समुद्र में रहने के बाद, आईएनएसवी कौंडिन्य को ज़मीन दिखी, जो उसकी ऐतिहासिक समुद्री यात्रा के आखिरी चरण की शुरुआत थी।"आईएनएसवी कौंडिन्य के इस सफर का हिस्सा रहे भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने एक्स पर कहा, "कप्तान विकास श्योराण और अभियान प्रभारी हेमंत कुमार के साथ इस लम्हे का आनंद ले रहा हूं। हमने कर दिखाया!" इस बीच ओमान में भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने सुल्तान कबूस बंदरगाह पहुंचकर भारत से आये यात्रियों का स्वागत किया। इस मौके पर ओमान में रह रहे कई भारतीय मूलनिवासी भी मौजूद रहे।

आईएनएसवी कौंडिन्य एक बुना हुआ पालपोत है जो पांचवीं शताब्दी ईस्वी के उस जहाज़ पर आधारित है जिसे अजंता गुफाओं की चित्रकला में दर्शाया गया है। इस परियोजना की शुरुआत जुलाई 2023 में संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और 'मेसर्स होडी इनोवेशंस' के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के माध्यम से हुई। इस परियोजना का वित्तपोषण संस्कृति मंत्रालय ने किया।

सितंबर 2023 में कील बिछाने के बाद जहाज़ का निर्माण पारंपरिक सिलाई विधि से किया गया। यह कार्य केरल के कुशल कारीगरों की एक टीम ने मास्टर शिपराइट श्री बाबू शंकरन के नेतृत्व में संपन्न किया। कई महीनों तक टीम ने नारियल के रेशे से बनी रस्सी, नारियल फाइबर और प्राकृतिक तरल पदार्थ रेज़िन का उपयोग करते हुए लकड़ी के तख्तों को जहाज़ के ढांचे पर सावधानीपूर्वक बुना। अंततः इस जहाज़ का फरवरी 2025 में गोवा में जलावतरण किया गया।

इस परियोजना में भारतीय नौसेना ने केंद्रीय भूमिका निभाई। डिज़ाइन और तकनीकी सत्यापन से लेकर निर्माण प्रक्रिया की निगरानी तक का काम नौसेना ने किया। ऐसे प्राचीन जहाज़ों के कोई जीवित ब्लूप्रिंट उपलब्ध न होने के कारण इसका निर्माण मूर्तिकला और चित्रात्मक स्रोतों के आधार पर अनुमानित करना पड़ा। नौसेना ने जहाज़ निर्माता के साथ मिलकर पतवार के आकार और पारंपरिक रिगिंग को पुनर्निर्मित किया तथा यह सुनिश्चित किया कि डिज़ाइन का सत्यापन आईआईटी के महासागर अभियांत्रिकी विभाग में हाइड्रोडायनामिक मॉडल परीक्षण के माध्यम से किया जाए।

इस जहाज का नाम पहली सदी के महान भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जो हिंद महासागर पार कर मेकांग डेल्टा तक गए थे। भारतीय नौसेना के पालपोत के रूप में शामिल किए जाने के बाद कौंडिन्य को 29 दिसंबर को गुजरात से ओमान रवाना किया गया था। नव-प्रविष्ट इस पोत में कई सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण विशेषताएं सम्मिलित हैं। इसके पालों पर गंडभेरुंड और सूर्य के प्रतीक अंकित हैं, इसके अग्रभाग (बो) पर सिंह-याली की मूर्ति है और डेक पर हड़प्पा शैली का प्रतीकात्मक पत्थर का लंगर स्थापित है।

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