धनबाद , अक्टूबर 13 -- झारखंड के आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के शोधकर्ताओं ने एक नई रासायनिक विधि विकसित की है, जिसकी मदद से महत्वपूर्ण रासायनिक यौगिक तैयार किए जा सकते हैं।

इस शोध के लिए भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने संस्थान को पेटेंट प्रदान किया है। इस तकनीक में दृश्य प्रकाश की मदद से रासायनिक प्रतिक्रिया कराई जाती है। यह शोध भविष्य में दवा अनुसंधान और दूसरे उपयोगी रासायनिक पदार्थों के विकास के लिए नए रास्ते खोल सकता है।

इस पेटेंट का शीर्षक "ए नोवेल बाइफंक्शनल फॉर्मिल-अमिनेशन इक्विवेलेंट रिएजेंट, अ प्रोसेस फॉर द प्रिपरेशन देयरऑफ, एंड द एप्लीकेशन देयरऑफ इन द सिंथेसिस ऑफ वन-टू-इमिनोएसीटल्स/बीटा-अमीनो एल्डिहाइड्स" है। पेटेंट संख्या 603073 है। इसके लिए आवेदन 18 जून 2025 को किया गया था और पेटेंट 18 सितंबर 2026 को प्रदान किया गया। इस शोध के आविष्कारकों में आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के केमिस्ट्री एंड केमिकल बायोलॉजी विभाग के डॉ. सौमित्र मैती और प्रधानमंत्री रिसर्च फेलोशिप के रिसर्च स्कॉलर पार्थ प्रतिम मंडल शामिल हैं।

शोध का मुख्य उद्देश्य बीटा-अमीनो एल्डिहाइड नामक रासायनिक यौगिकों को तैयार करने का एक बेहतर तरीका विकसित करना है। ये यौगिक दूसरे उपयोगी रासायनिक पदार्थों को बनाने में शुरुआती सामग्री के रूप में काम आते हैं। इनकी मदद से गामा-अमीनो अल्कोहल और बीटा-अमीनो एसिड जैसे यौगिक तैयार किए जा सकते हैं, जिनका अध्ययन औषधीय रसायन विज्ञान और अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में किया जाता है।

इस तरह के यौगिक तैयार करने में एक चुनौती यह रही है कि जरूरी रासायनिक घटकों को एक साथ जोड़ने के लिए उपयुक्त अभिकर्मक और अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत होती है। शोधकर्ताओं ने इस समस्या को दूर करने के लिए ग्लाइऑक्सिलिक एसिड एसीटल से बना एक विशेष रासायनिक अभिकर्मक विकसित किया है।

इस विधि में एल्कीन नामक शुरुआती रासायनिक पदार्थों पर दृश्य प्रकाश की मदद से प्रतिक्रिया कराई जाती है। इस दौरान दो जरूरी रासायनिक घटक एक साथ जुड़ते हैं, जिससे बीटा-अमीनो एल्डिहाइड तैयार करने का रास्ता मिलता है। आसान शब्दों में कहें तो यह तकनीक वैज्ञानिकों को उपयोगी रासायनिक अणुओं को तैयार करने का एक नया तरीका देती है, जिसमें दृश्य प्रकाश की अहम भूमिका है।

इस शोध का महत्व केवल एक नया रासायनिक यौगिक तैयार करने तक सीमित नहीं है। इससे भविष्य में जटिल रासायनिक अणुओं के निर्माण और दवा अनुसंधान से जुड़े अध्ययनों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके व्यावहारिक उपयोग और संभावित अनुप्रयोगों को स्थापित करने के लिए आगे और शोध की जरूरत होगी।

डॉ. सौमित्र मैती का शोध कार्य रेडिकल केमिस्ट्री, होमोजीनियस कैटेलिसिस, फोटोकैटेलिसिस और प्राकृतिक उत्पादों के संपूर्ण संश्लेषण जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है। उन्होंने इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस, जादवपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। उनके शोध का विषय टेरपेनॉइड्स के संश्लेषण से संबंधित था। रसायन विज्ञान में उनके शोध योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें केमिकल रिसर्च सोसाइटी ऑफ इंडिया के ब्रॉन्ज मेडल 2027 के लिए भी चुना गया है।

यह पेटेंट संस्थान में हो रहे शोध और नवाचार के प्रयासों को दर्शाता है। साथ ही, यह दिखाता है कि बुनियादी विज्ञान में किया गया शोध भविष्य में दवा अनुसंधान और अन्य रासायनिक क्षेत्रों में नई संभावनाएं विकसित करने में उपयोगी हो सकता है।

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