भोपाल , सितंबर 13 -- मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में रविवार को नृत्य, गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि 'संभावना' का आयोजन किया गया। इस दौरान छिंदवाड़ा के विजय कुमार मर्सकोले एवं साथियों ने गोंड जनजातीय गेड़ी नृत्य तथा हरदा की मीशा शर्मा एवं साथियों ने गणगौर नृत्य की प्रस्तुति दी। सायंकाल मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग के लिए जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा तैयार अहल्या लीला-नाट्य का मंचन किया गया।

लीला-नाट्य का निर्देशन पटना के श्री निलेश्वर मिश्रा, संगीत पटना के श्री सीताराम सिंह, आलेख रीवा के श्री योगेश त्रिपाठी तथा प्रकाश परिकल्पना नई दिल्ली के श्री अतुल मिश्रा ने की है। गतिविधि में कलाकारों का स्वागत जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने किया।

भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में प्रतिष्ठित पंचकन्याओं के जीवन, संघर्ष, त्याग, साहस और आदर्शों पर आधारित विशेष प्रस्तुतियों की श्रृंखला तैयार की जा रही है। इसी श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में अहल्या लीला-नाट्य प्रस्तुत किया गया। भारतीय मनीषा में पंचकन्याओं का स्मरण नारी के साहस, धैर्य, त्याग, आत्मबल और जीवन-संघर्ष की स्मृति के रूप में किया जाता है।

अहल्या महर्षि गौतम की पत्नी थीं और अपने सौंदर्य, तप तथा विद्वत्ता के लिए प्रसिद्ध थीं। पौराणिक कथा के अनुसार देवराज इंद्र महर्षि गौतम का रूप धारण कर अहल्या के आश्रम में प्रवेश करते हैं। घटना की जानकारी मिलने पर महर्षि गौतम ने इंद्र को श्राप दिया और अहल्या को भी श्रापित किया। श्राप के कारण अहल्या को लंबे समय तक एकांत और प्रतीक्षा का जीवन जीना पड़ा। उन्हें अदृश्य रहते हुए वायु का सेवन कर श्रीराम नाम जपने तथा शिला रूप में रहने का श्राप मिला। भगवान श्रीराम के महर्षि विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम पहुंचने पर श्रीराम के चरण-स्पर्श से अहल्या का उद्धार हुआ। इसके बाद वे पुनः मानवीय स्वरूप में लौटीं और महर्षि गौतम से उनका मिलन हुआ।

लीला-नाट्य में अहल्या की कथा के माध्यम से नारी की गरिमा, सामाजिक दृष्टि, न्याय, करुणा और मुक्ति जैसे प्रश्नों को सामने रखा गया। एक घंटा 17 मिनट की इस प्रस्तुति में 50 से अधिक कलाकारों ने सहभागिता की तथा लीला-नाट्य में 10 से अधिक दृश्य प्रस्तुत किए गए।

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में प्रत्येक रविवार दोपहर दो बजे से आयोजित होने वाली 'संभावना' गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुतियों के साथ देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने और समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा।

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