मोतिहारी , मई 28 -- बिहार में पूर्वी चंपारण जिले के रक्सौल स्थित डंकन चैरिटेबल अस्पताल पर एक गरीब कुष्ठ पीड़ित परिवार के जच्चा बच्चा को इलाज के बिल भुगतान के लिए कथित रूप से घंटों बंधक बनाकर रखने का गंभीर आरोप लगाया गया है। पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी (डीएम) सौरभ जोरवाल ने आज यहाँ बताया कि मोतिहारी प्रेस क्लब की तरफ से दी गई सूचना का त्वरित संज्ञान लेते हुए मामले में हस्तक्षेप कर अस्पताल से नवजात बच्ची और उसके परिजनों को बिना कोई अतिरिक्त राशि लिए मुक्त कराया गया । उन्होंने बताया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि रामगढ़वा कुष्ठ आश्रम निवासी और 40 प्रतिशत शारीरिक अक्षमता के शिकार गणेश पासवान की पुत्री ललिता कुमारी को प्रसव पीड़ा होने पर 22 मई को रक्सौल के डंकन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में सिजेरियन ऑपरेशन के माध्यम से प्रसव कराया गया, जिससे ललिता ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया।

श्री जोरवाल ने कहा कि पीड़ीत परिवार ने आरोप लगाया है कि डॉक्टरों द्वारा छुट्टी दिए जाने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने ललिता के इलाज का लगभग 45,000 रुपये और नवजात बच्ची की चिकित्सा का 15,850 रुपये (कुल करीब 60,000 रुपये से अधिक) का भारी-भरकम विपत्र (बिल) कुष्ठ पीड़ित परिवार को सौंप दिया। बिल का भुगतान न होने के कारण अस्पताल प्रबंधन ने सुबह ही चिकित्सा से मुक्त हुई प्रसूता और उसकी नवजात बच्ची को रात नौ बजे तक रोके रखा। इस परिवार ने अपनी जमा-पूंजी से प्रारंभिक रूप से 3,500 रुपये अस्पताल में जमा किए थे।

इस बीच पीड़ित परिवार ने फोन पर एक वरिष्ठ अधिकारी से सहायता की गुहार लगाई जिन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए मोतिहारी प्रेस क्लब को हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने सुंदरपुर (रक्सौल) कुष्ठ आश्रम के संचालक कृष्णा यादव के माध्यम से अस्पताल प्रबंधन से संपर्क साधा और परिवार की लाचारी का हवाला देते हुए उन्हें छोड़ने का अनुरोध किया, लेकिन अस्पताल प्रशासन अपनी जिद पर अड़ा रहा।

श्री जोरवाल ने बताया कि प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने उन्हें तथा उप विकास आयुक्त प्रदीप कुमार और रक्सौल के अनुमण्डलाधिकारी से संपर्क कर स्थिति से अवगत कराया। जिला प्रशासन के कड़े रुख के बाद अस्पताल प्रबंधन ने देर रात किसी अतिरिक्त राशि का भुगतान लिए बगैर प्रसूता तथा उसकी बच्ची को अस्पताल से छुट्टी दी ।

इस बीच डंकन चैरिटेबल अस्पताल के निदेशक डॉ. प्रभु ने संवाद एजेंसी "यूनीवार्ता" से बातचीत में बंधक बनाए जाने के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अनुचित बताया। उन्होंने कहा, "दूसरा बच्चा तक तो ठीक था, लेकिन तीसरे बच्चे की योजना बनाने से पहले दंपत्ति को अपनी आर्थिक स्थिति का आकलन कर लेना चाहिए था। संस्थान गरीबों की सेवा निःशुल्क करता तो है, लेकिन ऐसे मामलों में हमारे भी हाथ बंधे होते हैं।" निदेशक ने बताया कि बाद में मानवीय आधार पर परिवार के सभी प्रकार के शुल्क को माफ कर उन्हें अस्पताल से सम्मानपूर्वक विदा कर दिया गया।

उल्लेखनीय है कि प्रसूता ललिता के पिता कुष्ठ रोग से पीड़ित हैं और उसका पति भी कबाड़ चुनकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम करता है।

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