रायपुर , जुलाई 03 -- छत्तीसगढ़ सरकार ने खरीफ सीजन 2026 में अल-नीनो के संभावित प्रभाव और कम वर्षा की संभावना को देखते हुए किसानों के लिए सामान्य आकस्मिक कार्ययोजना जारी की है। किसानों से धान की रोपा पद्धति के बजाय डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक अपनाने तथा कम अवधि वाली फसलों और वैकल्पिक दलहनी-तिलहनी फसलों की खेती पर जोर देने की अपील की गई है।
कृषि विभाग से आज प्राप्त जानकारी के अनुसार डीएसआर तकनीक से लगभग 20 प्रतिशत पानी की बचत होती है, प्रति एकड़ करीब पांच हजार रुपये तक लागत घटती है और फसल 12 से 15 दिन पहले तैयार हो जाती है। विभाग ने वर्षा की अनिश्चितता को देखते हुए कम एवं मध्यम अवधि में पकने वाली किस्मों के चयन की सलाह भी दी है।
सरकार ने किसानों को वर्षा पूर्व खेतों की सफाई, समय पर जुताई, मेड़बंदी और वर्षा जल संरक्षण के उपाय अपनाने का सुझाव दिया है। उच्च भूमि वाले क्षेत्रों में धान के स्थान पर अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, तिल, रामतिल और सोयाबीन जैसी कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की खेती करने की सलाह दी गई है। कतार पद्धति से बुवाई करने पर भी जोर दिया गया है, जिससे नमी संरक्षण और खरपतवार नियंत्रण बेहतर होता है।
कृषि विभाग ने बीज उपचार को अनिवार्य बताते हुए कार्बेन्डाजिम, थायमेथोक्साम-इमिडाक्लोप्रिड तथा विभिन्न फसलों के लिए अनुशंसित जैव उर्वरकों के उपयोग की सलाह दी है। यदि 15 जुलाई तक अंकुरण नहीं होता है तो पुनः बुवाई के समय सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक बीज उपयोग करने की अनुशंसा की गई है। जुलाई के अंत तक मूंग और उड़द तथा अगस्त में तिल, सूरजमुखी और मध्यम अवधि की अरहर की बुवाई करने का सुझाव भी दिया गया है।
कम वर्षा की स्थिति में संतुलित उर्वरक उपयोग पर बल देते हुए नत्रजन उर्वरकों की सीमित मात्रा, दो प्रतिशत यूरिया घोल के पर्णीय छिड़काव अथवा प्रति एकड़ दो बोतल नैनो यूरिया के उपयोग की सलाह दी गई है। दलहनी एवं तिलहनी फसलों में बुवाई के लगभग एक माह बाद दो प्रतिशत डीएपी घोल के पर्णीय छिड़काव की भी अनुशंसा की गई है।
सरकार ने गांवों में अस्थायी बांध बनाकर, डबरियों, तालाबों और कुओं में वर्षा जल संग्रहित करने तथा आवश्यकता पड़ने पर जीवन रक्षक सिंचाई के लिए उसका उपयोग करने की सलाह दी है। किसानों से मौसम पूर्वानुमान के आधार पर कृषि कार्य करने, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने तथा कृषि संबंधी कठिनाई की स्थिति में कृषि महाविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग से वैज्ञानिक सलाह लेने की अपील की गई है।
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