चेन्नई , अगस्त 02 -- पीएमके अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद अम्बुमणि रामदास ने रविवार को सत्तारूढ़ तमिझगा वेट्री कषगम (टीवीके) से पिछली द्रमुक सरकार के दौरान शुरू की गयी मामल्लन जलाशय परियोजना को रद्द करने, मछुआरा समुदाय की आजीविका की रक्षा करने और पर्यावरण को बचाने का आग्रह किया।

श्री रामदास ने यहां जारी बयान में कहा कि तमिलनाडु सरकार की चेन्नई शहर के लिए पेयजल के अतिरिक्त स्रोत के रूप में शुरू की गयी मामल्लन परियोजना को बंद न करने के फैसले की रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली है। यह परियोजना पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है और चेन्नई के पूर्वी तट पर रहने वाले 5,000 मछुआरा परिवारों की आजीविका खतरे में डाल सकती है। उन्होंने कहा कि जो सरकार जनता को इस मछुआरा-विरोधी परियोजना को रद्द करने का आश्वासन देकर सत्ता में आयी थी, उसका अब अपने वादे से पीछे हटना निंदनीय है।

चेन्नई के छठे पेयजल स्रोत के रूप में काम करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 19 जनवरी को 5,161 एकड़ क्षेत्र में 342.60 करोड़ रुपये की लागत से मामल्लन जलाशय की आधारशिला रखी थी। ईसीआर और ओएमआर के साथ तिरुपोरूर तथा तिरुकझुकुंद्रम के बीच कोवलम उप-बेसिन क्षेत्र में स्थित इस जलाशय की कुल भंडारण क्षमता 1.65 टीएमसीएफटी है, जो बार-बार भरे जाने पर वार्षिक 2.25 टीएमसीएफटी क्षमता तक पहुंच जाती है और प्रतिदिन 170 मिलियन लीटर पानी की आपूर्ति करती है। इससे शोलिंगनल्लूर, मेदवक्कम और पल्लीकरनई जैसे तेजी से विकसित हो रहे दक्षिणी उपनगरों के लगभग 13 लाख निवासियों को लाभ मिलने की उम्मीद थी।

ऊपरी हिस्से के 69 तालाबों से निकलने वाले अतिरिक्त पानी को समुद्र में बहने देने के बजाय इस जलाशय में संग्रहित किया जाना था, जिससे समुद्री पानी के प्रवेश को रोका जा सके और स्थानीय मछली पकड़ने के अधिकारों की रक्षा करते हुए बकिंघम नहर के 15 से 18 किमी के हिस्से को बहाल किया जा सके।

पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. अम्बुमणि ने कहा कि जब इसकी आधारशिला रखी गयी थी, तब पीएमके ने मछुआरों की आजीविका और पर्यावरण पर पड़ने वाले इसके गंभीर परिणामों का हवाला देते हुए इसका कड़ा विरोध किया था। शोलिंगनल्लूर और तिरुपोरूर जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान टीवीके ने भी इस परियोजना का विरोध किया था। मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान जनता को आश्वासन दिया था कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कोई भी परियोजना लागू नहीं की जायेगी।

.उसी आश्वासन पर कोवलम के आसपास रहने वाले मछुआरा समुदायों को पूरा विश्वास था कि मामल्लन जलाशय परियोजना को रद्द कर दिया जायेगा।टीवीके सरकार के पदभार संभालने के तीन महीने बाद भी हालांकि परियोजना रद्द करने संबंधी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गयी है। इसके विपरीत, रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इसके निर्माण को आगे बढ़ाने की तैयारियां चल रही हैं। पीएमके नेता ने कहा कि इससे मछुआरा समुदाय बेहद निराश है और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है।मामल्लन जलाशय के लिए प्रस्तावित स्थल एक प्राकृतिक अजूबा है। यही वह जगह है, जहां समुद्री पानी और मीठा पानी आपस में मिलते हैं, जिससे एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र बनता है, जहां केकड़े, झींगे और मछलियों की दुर्लभ प्रजातियां प्रजनन करती हैं।

इसके अलावा इस क्षेत्र की आर्द्रभूमि अपनी विशिष्ट पारिस्थितिक विशेषताओं के कारण दुनिया भर से सैकड़ों-हजारों प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती हैं। यदि जलाशय निर्माण के नाम पर इस मुहाना पारिस्थितिकी तंत्र को अवरुद्ध कर दिया जाता है, तो इसका अनूठा पर्यावरण संतुलन नष्ट हो जायेगा, जिससे क्षेत्र का मत्स्य पालन पूरी तरह ठप हो जायेगा।

कानाथुर रेड्डीकुप्पम से कोक्किलीमेडू तक का इलाका कई मछुआरा गांवों का घर है। इन गांवों के लगभग 5,000 मछुआरा परिवार अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से इन जलाशयों में मछली पकड़ने पर निर्भर हैं। यदि मामल्लन जलाशय बनता है, तो स्थानीय मत्स्य संसाधन पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे, जिससे ये परिवार अपनी आजीविका के मुख्य साधन से वंचित हो जायेंगे। इसके अलावा, यह परियोजना क्षेत्र के जैव विविधता से समृद्ध आवास को नष्ट कर देगी। प्रवासी पक्षी इन आर्द्रभूमियों पर आना पूरी तरह बंद कर देंगे। सबसे बढ़कर, यह परियोजना ईस्ट कोस्ट रोड क्षेत्र को समुद्र के विनाशकारी प्रभाव के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देगी।

उन्होंने कहा कि कानाथुर रेड्डीकुप्पम और कोक्किलीमेडू के बीच के बैकवाटर और दलदली भूमि प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में काम करते हैं, जो भीतरी इलाकों को समुद्र के थपेड़ों से बचाते हैं। यदि मामल्लन जलाशय बनाने के लिए इन प्राकृतिक सुरक्षा कवचों को नष्ट कर दिया जाता है, तो तटीय गांवों के साथ-साथ भीतरी इलाकों में भी समुद्री पानी घुस सकता है और चक्रवात एवं तूफानों के दौरान भारी नुकसान पहुंचा सकता है। इस बात से कोई असहमति नहीं है कि जैसे-जैसे चेन्नई महानगरीय क्षेत्र और इसकी आबादी साल-दर-साल बढ़ रही है, पेयजल की बढ़ती मांग को पूरा करने और बारिश के पानी को बेकार में समुद्र में बहने से रोकने के लिए नये जलाशयों की आवश्यकता है।

श्री अम्बुमणि ने कहा कि वास्तव में पीएमके ने इसी उद्देश्य के लिए लगातार नये जलाशयों के निर्माण की वकालत की है। ऐसे जलाशयों के निर्माण के लिए प्रकृति से उपहार में मिली आर्द्रभूमि और प्राकृतिक दलदलों को नष्ट करना पर्यावरण पर हमले के समान है और ऐसे कदमों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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