कोलकाता , फरवरी 09 -- तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने सोमवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का विरोध करने के लिए कविता का सहारा लिया।

उन्होंने सोशल मीडिया पर "अमी ओस्विकार कोरी" (मैं करता हूं अस्वीकार) नाम की एक कविता पोस्ट की। इन कविताओं का लहजा तीखा और विषय राजनीतिक है। मौजूदा सरकारी तंत्र और उसके शासकों के दमनकारी स्वभाव पर निशाना साधती है।

अपनी साहित्यिक प्रतिभा के लिए जानी जाने वाली अभिषेक की चाची और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अक्सर राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर कविताएं लिखती रही हैं। इस बार उनके भतीजे और पार्टी के साथी ने भी ऐसा ही किया और विरोध दर्शाने के लिए कविता लिखी है।

अभिषेक ने अपनी कविता में वाम या अति वाम लेखन से जुड़ी शब्दावली का इस्तेमाल किया है। इसमें 'राज' को दमन और शोषण के औजार के रूप में दर्शाया है। एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ी परेशानी और मौतों का ज़िक्र करते हुए डायमंड हार्बर के सांसद ने खुद को आम लोगों की तकलीफ का 'साक्षी' बताया हैं।

सबसे खास हिस्सों में से एक में वह एसआईआर की बनायी 'मौत की घाटी' के बारे में लिखते हैं, "आमि ओस्वीकार कोरि/ एइ होठकारिता, एइ तालिकार शासन, एइ भयेर राजोत्व। आमि ओस्वीकार कोरि/ राष्ट्रेर नामे रक्तेर ऋण, आमि ओस्वीकार कोरि - रक्तेर ओपोर कालिर शासन।" (मैं करता हूं अस्वीकार/ यह विवेकहीन हठधर्मिता, यह सूचियों का शासन, यह आतंक का राज। मैं करता हूं अस्वीकार/ राष्ट्र के नाम पर रक्त का ऋण, मैं करता हूं अस्वीकार/ रक्त पर स्याही का राज।)अभिषेक का दावा है कि एसआईआर कवायद के दौरान अब तक लगभग 150 लोग मारे गये हैं। वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, उससे कहीं ज़्यादा है।

वह लिखते हैं, "एटा शुधु संख्या नोय, ए राष्ट्रेर लागानो आगुने मानुषेर चीत्कार।"(यह नहीं महज अंककार/ राष्ट्र की लगायी आग में जलते मानुषों की है चीत्कार।)इस प्रक्रिया के खोखलेपन को लक्षित करती कविता आगे बढ़ती है: "राष्ट्रेर खा़ताय स्थान पाय प्रानेर बोदोले पोरिसोंख्यान, शासौकेर बुटेर तो़लाय पिशे जाय बिबेक, शोत्तो आर शम्मान।" (राष्ट्र के बही-खातों में प्राणों के बदले मिलता है आंकड़ों को स्थान/ शासक के जूतों के नीचे कुचल दिए जाते हैं विवेक, सत्य और सम्मान।)इतिहास का जिक्र करते हुए अभिषेक चेतावनी देते हैं कि अन्याय अनदेखा नहीं होता: "आर इतिहास - से ख़ोमा कोरे ना, से तालिका पोड़े ना। इतिहास मोने राखे के रुकेछिलो, के लोड़ाई कोरेछिलो।" (और इतिहास/ क्षमा नहीं वह करता/ सूचियों को नहीं वह पढ़ता।/ इतिहास याद रखता है कि कौन था अड़ा, कौन था लड़ा।)भाषा और कल्पना के इस चुनाव ने राजनीतिक हलकों में उत्सुकता जगा दी है। कई लोग यह सोच रहे हैं कि क्या अभिषेक, तृणमूल के पारंपरिक आधार से आगे बढ़कर, कविता को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर वामपंथी झुकाव वाले भाजपा-विरोधी मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

यह कविता ममता बनर्जी की हाल ही में कोलकाता अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में नौ नई पुस्तकों के विमोचन के तुरंत बाद आयी है। इन पुस्तकों में कविताओं का एक संग्रह भी शामिल है, जिनमें से कई 'एसआईआर' प्रक्रिया के दौरान की पीड़ा और मौतों पर केंद्रित हैं।

अभिषेक के कविता के क्षेत्र में उतरने के साथ ही, पश्चिम बंगाल में 'एसआईआर' के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई में कविता एक और नये मोर्चे के रूप में उभरी है।

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