चेन्नई , जून 17 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने अन्नाद्रमुक की उस याचिका पर तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष और अन्य पक्षों को बुधवार को नोटिस जारी किया, जिसमें पार्टी के चार विधायकों का इस्तीफा स्वीकार करने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी गयी है। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 29 जून निर्धारित की है।

अन्नाद्रमुक के चार विधायकों ने पार्टी ह्विप का उल्लंघन कर विधानसभा में टीवीके सरकार के विश्वास मत हासिल करने के दौरान उसके पक्ष में मतदान किया था। बाद में ये विधायक मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की सत्तारूढ़ पार्टी 'तमिलगा वेट्री कषगम' (टीवीके) में शामिल हो गये थे।

विधानसभा अध्यक्ष ने जब इनका इस्तीफा स्वीकार किया, तब इनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही पहले से ही लंबित थी।

यह याचिका अन्नाद्रमुक के ह्विप और पूर्व मंत्री एस एस एग्री कृष्णमूर्ति ने दायर की थी। जब मुख्य न्यायाधीश एस ए धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरुगन की खंडपीठ के सामने इस पर सुनवाई हुई तो अदालत ने इन चार सीटों पर उपचुनाव रोकने की मांग खारिज कर दी। इसके साथ ही खंडपीठ ने तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष और सचिव, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव अधिकारी और चारों पूर्व विधायकों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया।

श्री कृष्णमूर्ति ने सोमवार को याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के चारों विधायकों का इस्तीफा स्वीकार किये जाने के फैसले को रद्द करने की मांग की थी।

श्री प्रभाकर के फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि यह कदम दलबदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) को दरकिनार करने जैसा है। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग को इन चार सीटों पर उपचुनाव कराने की अधिसूचना जारी करने से रोकने का भी अनुरोध किया।

खरीद-फरोख्त के आरोपों को हवा देते हुए मरगाथम कुमारवेल (मदुरंतकम-एससी चुनाव क्षेत्र), एस जयकुमार (पेरुंदुरई), पी सत्यभामा (धारापुरम-एससी) और इसाक्की सुब्बैया (अंबासमुद्रम) ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया और टीवीके में शामिल हो गये।

गौरतलब है कि 13 मई को हुए विश्वास मत में इन चारों सहित 25 विधायकों ने सरकार के पक्ष में मतदान किया था।

आज की सुनवाई के दौरान अन्नाद्रमुक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी गिरि पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि इन विधायकों ने 25 मई को अपने इस्तीफे सौंपे थे और उसी दिन उन्हें स्वीकार भी कर लिया गया। इसके तुरंत बाद गजट अधिसूचना भी जारी कर दी गयी। उन्होंने कहा कि इन विधायकों को उसी दिन टीवीके में शामिल कर लिया गया। उनके अनुसार, यह पूरी क्रोनोलॉजी सीधे-सीधे खरीद-फरोख्त की ओर इशारा करती है।

श्री गिरि ने दलील दी, " विरोधी दल में सदस्यता देने का एक इरादा था, जो साफ दिखाई दे रहा है। इसी को हम खरीद-फरोख्त कहते हैं। इस्तीफा कई अन्य चीजों के वादे के साथ आता है। "उन्होंने तर्क दिया कि यदि विधानसभा अध्यक्ष ने उचित जांच की होती तो अन्नाद्रमुक को नोटिस जारी किया जाना चाहिए था, ताकि पार्टी अपनी आपत्तियों को रिकॉर्ड पर रख सके।

राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता विजय नारायण ने तर्क दिया कि विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका केवल यह जांचने तक सीमित थी कि इस्तीफा पत्र स्वेच्छा से सौंपा गया है या नहीं और क्या वह सही है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने मामले की सुनवाई 29 जून तक के लिए स्थगित कर दी।

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