कोलकाता , जुलाई 13 -- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने परिसर के भीतर वरिष्ठ अधिवक्ताओं बिकैश रंजन भट्टाचार्य, फिरदौस शमीम और बिक्रम बनर्जी के घेराव और उत्पीड़न में शामिल तृणमूल कांग्रेस नेता कुणाल घोष और शिक्षक पद के अभ्यर्थियों में से प्रत्येक पर सोमवार को 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

यह आदेश न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी, न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति राजर्षि भारद्वाज की तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने पारित किया, जिसका गठन अदालत ने इस घटना का स्वतः संज्ञान लेने के बाद किया था।

यह विवाद अतिरिक्त पद सृजन से शारीरिक शिक्षा और कार्य शिक्षा में उम्मीदवारों की नियुक्ति से संबंधित चल रहे मामले से उत्पन्न हुआ था।

अधिवक्ता फिरदौस शमीम ने उच्च न्यायालय के समक्ष भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं को चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता बिकैश रंजन भट्टाचार्य ने नौकरी चाहने वालों के एक वर्ग के रुख का कड़ा विरोध किया था।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विश्वजीत बसु ने टिप्पणी की कि हालांकि उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जांच की प्रगति पर सवाल उठाये गये थे, फिर भी राज्य सरकार को लिखित में यह बताना होगा कि अतिरिक्त पद किसके निर्देशों पर सृजित किये गये थे।

इस टिप्पणी के बाद उच्च प्राथमिक शिक्षक पद के अभ्यर्थियों के एक वर्ग ने उच्च न्यायालय में श्री भट्टाचार्य के चैंबर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया।

उन्होंने सवाल उठाया कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बावजूद भर्ती के मामले आगे क्यों नहीं बढ़ रहे हैं और वरिष्ठ अधिवक्ता का न्यायमूर्ति विश्वजीत बसु के साथ सांठगांठ का भी आरोप लगाया।

उच्च न्यायालय परिसर के भीतर अधिवक्ताओं के घेराव और उत्पीड़न को संस्थान की गरिमा और अधिवक्ताओं की सुरक्षा पर गंभीर हमला मानते हुए उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई शुरू की।

इसके बाद घटना की जांच के लिए तीन न्यायाधीशों की एक विशेष पीठ का गठन किया गया। इस घटनाक्रम ने उच्च न्यायालय बार के एक बड़े हिस्से के तीव्र विरोध को भी जन्म दिया।

श्री बिकैश रंजन भट्टाचार्य और श्री फिरदौस शमीम के नेतृत्व में अधिवक्ताओं ने अदालत परिसर के भीतर विरोध मार्च निकाला और कानूनी बिरादरी के सदस्यों की धमकी व उत्पीड़न की निंदा की।

मामला निपटाते हुए विशेष पीठ ने श्री घोष और शामिल अभ्यर्थियों में से प्रत्येक पर 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया। इसके साथ ही न्यायालय ने साफ कर दिया कि अधिवक्ताओं को डराने-धमकाने या उच्च न्यायालय के काम और गरिमा में रुकावट डालने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जायेगी।

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