जालौन , मार्च 22 -- उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित अक्षरा देवी धाम आस्था, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। जिला मुख्यालय उरई से करीब 40 किलोमीटर दूर सैदनगर क्षेत्र में पवित्र बेतवा नदी (वेत्रवती) के तट पर स्थित यह शक्तिपीठ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का विशेष केंद्र बना हुआ है।

यह धाम अब सड़क मार्ग से सुगम हो चुका है। एट जंक्शन से करीब 12 किलोमीटर दूर कोटरा रोड के पास ग्राम कुरकुरू से लिंक मार्ग के जरिए श्रद्धालु यहां आसानी से पहुंच सकते हैं। विद्वानों के अनुसार यह शक्तिपीठ वैदिक काल के पश्चात तांत्रिक काल में भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इसे जगदंबा उपासना की सिद्धि पीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र त्रिकोणीय स्वरूप में बेतवा नदी के तटों पर स्थित था, जिसे साधक गायत्री पीठ, त्रिपुर सुंदरी पीठ और महालक्ष्मी पीठ के रूप में पूजते रहे हैं।

मंदिर के पुजारी संतोष पांडा के अनुसार 'अक्षरा' शब्द उस दिव्य शक्ति का प्रतीक है जो कभी नष्ट नहीं होती। मान्यता है कि ब्रह्मांड में लिपि का उद्भव इसी स्थल से हुआ और इसे सृजन एवं चेतना का मूल केंद्र माना जाता है। इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहां देवी किसी मूर्ति या पिंडी के रूप में नहीं, बल्कि यंत्र रूप में विराजमान हैं। गर्भगृह में साढ़े तीन मात्राओं के विशेष यंत्र के रूप में मां की स्थापना है, जो इसे अन्य शक्तिपीठों से अलग बनाती है और यहां तांत्रिक एवं बौद्धिक साधना को विशेष महत्व दिया जाता है।

धार्मिक परंपराओं के अनुसार यहां बलि प्रथा पूरी तरह निषिद्ध है। मंदिर परिसर में नारियल फोड़ना, तेल का दीपक जलाना और तामसी-राजसी पदार्थों का उपयोग वर्जित है। श्रद्धालु नारियल चढ़ाने के लिए मंदिर के पीछे स्थित पहाड़ी का उपयोग करते हैं, जबकि हवन भी मंदिर के बाहर निर्धारित वेदी पर ही किया जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बेतवा नदी को भगवान शिव के अश्रुओं से उत्पन्न माना जाता है, जब माता सती ने दक्ष यज्ञ में आत्माहुति दी थी। इसी कारण इस नदी को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायिनी माना जाता है और इसे 'कलियुग की गंगा' भी कहा जाता है।

मंदिर के सामने स्थित प्राकृतिक कुंड भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है, जिसे सैदोलक जल का स्रोत माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस जल में विशेष औषधीय गुण हैं। नवरात्र के दौरान यह धाम भक्ति का प्रमुख केंद्र बन जाता है। श्रद्धालु नौ दिनों तक यहां साधना करते हैं और चैत्र नवरात्र के बाद एकादशी पर भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों की संख्या में भक्त शामिल होते हैं।

अक्षरा देवी धाम न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि भारतीय संस्कृति, तंत्र साधना और प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है, जहां श्रद्धा के साथ-साथ साधना और आध्यात्मिक अनुभव का अद्वितीय संगम देखने को मिलता है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित