अमृतसर , जून 11 -- पंजाब में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता एवं सिख चिंतक प्रो. सरचांद सिंह ख्याला ने गुरुवार को कहा कि बहिबल कलां गोलीकांड मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) के समक्ष श्री अकाल तख्त साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह द्वारा शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ दर्ज कराए गए बयान ने पंथक और संवैधानिक स्तर पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये हैं।
प्रो. ख्याला ने कहा कि इस पूरे मामले को किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दल के पक्ष अथवा विरोध के नजरिए से देखने के बजाय श्री अकाल तख्त साहिब की मर्यादा, ऐतिहासिक परंपराओं और पंथक स्वायत्तता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि श्री बादल के साथ राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद यह तथ्य स्पष्ट है कि अकाल तख्त साहिब के समक्ष उन्होंने बहिबल कलां गोलीकांड के दौरान अपनी सरकार के कार्यकाल में घटना घटित होने की नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार की थी, न कि किसी साजिश के तहत निहत्थे लोगों पर गोली चलवाने की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी।
उन्होंने कहा कि जत्थेदार जैसे महत्वपूर्ण पद पर रह चुके व्यक्ति को ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए था, जिससे अकाल तख्त साहिब की पंथक प्रक्रियाओं को कानूनी व्याख्याओं के दायरे में लाया जाए। उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को भी धार्मिक व्यक्तित्वों को राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करने से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसियों के पास किसी मामले में स्वतंत्र और कानूनी रूप से मान्य साक्ष्य मौजूद हैं तो उनके आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन धार्मिक मंचों पर हुई पंथक प्रक्रियाओं को राजनीतिक और कानूनी संघर्ष का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।
भाजपा नेता ने कहा कि बहिबल कलां गोलीकांड एक बेहद दुखद और संवेदनशील घटना है तथा पीड़ित परिवारों को न्याय मिलना चाहिए। इसके लिए कानून को स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करने दिया जाना चाहिए और यदि कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। हालांकि इस प्रक्रिया के दौरान धार्मिक संस्थाओं की विशिष्टता और मर्यादा को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
प्रो. ख्याला ने कहा कि श्री अकाल तख्त साहिब सिख पंथ की सर्वोच्च धार्मिक संस्था है, जहां व्यक्ति धार्मिक और नैतिक जवाबदेही के आधार पर उपस्थित होता है। यहां होने वाली पेशियां, मांगी जाने वाली क्षमायाचनायें और स्वीकार की जाने वाली जिम्मेदारियां मुख्य रूप से पंथक अनुशासन और धार्मिक उत्तरदायित्व से जुड़ी होती हैं। इन्हें सीधे तौर पर आपराधिक मामलों में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करना भविष्य में गंभीर धार्मिक और कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि अकाल तख्त साहिब के समक्ष हुए कबूलनामों और धार्मिक प्रक्रियाओं को जांच एजेंसियों द्वारा साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने की परंपरा शुरू हो जाती है, तो भविष्य में लोगों के मन में यह भय पैदा हो सकता है कि धार्मिक मंचों पर की गई उनकी पेशी का उपयोग बाद में उनके खिलाफ आपराधिक मामलों में किया जा सकता है।
प्रवक्ता ने कहा कि अकाल तख्त साहिब से जुड़े किसी भी व्यक्ति को समकालीन राजनीतिक टकराव का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिख इतिहास में अकाल तख्त साहिब ने हमेशा पंथक एकता, न्याय और आत्मसम्मान के केंद्र के रूप में भूमिका निभाई है। इसलिए इसकी प्रक्रियाओं और परंपराओं का उपयोग तात्कालिक राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि बहिबल कलां गोलीकांड के पीड़ित परिवारों को न्याय मिले, साथ ही अकाल तख्त साहिब की मर्यादा, पंथक स्वायत्तता और धार्मिक संस्थाओं की पवित्रता भी अक्षुण्ण बनी रहे। न्याय और मर्यादा के बीच संतुलन बनाए रखना ही समाज और पंथ के व्यापक हित में होगा।
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